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षष्ठम अध्याय-संवेशन प्रकरण : संभोग क्रिया आसन

श्लोक (1)- रागकाले विशाल यन्स्येव जघनं मृगी संविशेदुच्चरेत।।
अर्थ : इसमें संभोग क्रिया करने के अलग-अलग तरीकों को बताया जाएगा।

श्लोक (2)- अवहासयन्तीव हस्तिनी नीचरते।।
अर्थ : अगर बड़ी योनि वाली हस्तिनी स्त्री छोटे लिंग वाले शश पुरुष के साथ संभोग करती है तो उसे अपनी जांघों को सिकोड़ लेना चाहिए।

श्लोक (3)- न्याय्यो यत्र योगस्तत्र समपुष्ठम्।।
अर्थ : अगर स्त्री और पुरुष के योनि और लिंग एक ही आकार के हो तो ऐसे में संभोग क्रिया के समय स्त्री को अपनी जांघों को समेटने की जरूरत नहीं है।

श्लोक (4)- आभ्यां वडवा व्याख्याता।।
अर्थ : पहले बताई गई दोनों तरह की जातियों की तरह ही बढ़वा जाति की स्त्रियों के बारे में समझा जाता है। जैसे पुरुष अगर अश्व जाति से संबंधित है तो बढ़वा जाति की स्त्री को संभोग करते समय अपनी जांघों को चौड़ा कर लेना चाहिए लेकिन अगर पुरुष वृष जाति से संबंधित है तो स्त्री को अपनी जांघों को समान्य ही रखना चाहिए।

श्लोक (5)- तत्र जघनेन नायकं प्रतिगृह्वीयात्।
अर्थ : संभोग करते समय स्त्री को लेटने के बाद अपनी दोनों जांघों से पुरुष को जकड़ लेना चाहिए।

श्लोक (6)- अपद्रव्याणि च सविशेषं नीचरते।।
अर्थ : अगर संभोग करने वाले पुरुष का लिंग छोटा है और वह स्त्री की काम-उत्तेजना को शांत करने में असमर्थ रहता है तो इसके लिए स्त्री नकली लिंग का प्रयोग कर सकती है।

श्लोक (7)- उत्फुल्लकं विजृम्भितकमिन्द्राणिकं चेति त्रितयं मृग्याः प्रायेण।।
अर्थ : उत्फुल्लक, विजृम्भितक और इन्द्राणिक तरीकों से मृगी स्त्री को अपनी योनि चौड़ी करनी चाहिए।

श्लोक (8)- शिरो विनिपात्योर्ध्व जघनमुत्फुल्लकम्।।
अर्थ- उत्फुल्लक :
मृगी स्त्री अगर अपने शिरोभाग को नीचा करके कटि वाले भाग को ऊंचा कर लेती है तो इससे उसका योनिद्वार चौड़ा हो जाता है। इसे उत्फुल्लक कहते हैं। इसके लिए स्त्री को अपनी कमर के नीचे तकिया रख लेना चाहिए।

श्लोक (9)- तत्रापसारं दद्यात्।।
अर्थ : जब स्त्री का शिरोभाग नीचा हो जाए और नितंब वाला भाग ऊंचा उठ जाए तो उस समय स्त्री और पुरुष को संभोग करते समय थोड़ा पीछे हटते जाना चाहिए।

श्लोक (10)- अनीचे सक्थिनी तिर्यगवसज्य प्रतीच्छेदिति विजृम्भितकम्।।
अर्थ- विजृम्भितक :
स्त्री की दोनों जांघों को फैलाकर ऊंचा उठाने से उसका योनिद्वार चौड़ा हो जाता है। ऐसे में अगर पुरुष अपने लिंग को तिरछा करके स्त्री की योनि में प्रवेश कराता है तो उसे विजृम्भितक कहा जाता है।

श्लोक (11)- पार्श्र्वयोः सममूरू विन्यस्य पार्श्र्वयोर्जानुनी निदध्यादित्यभ्यासयोगादिन्द्राणी।।
अर्थ : सबसे पहले इस संभोग क्रिया की इस विधि को इंद्राणी ने किया था जिसकी वजह से इसका नाम इन्द्राणी पड़ा। इस विधि का थोड़े दिनों तक अभ्यास करने से यह पूरी तरह से आ जाती है। पुरुष को स्त्री की जांघों को अपने दोनों हाथों से पकड़ लेना चाहिए और उसके पैरों को अपनी दोनों कांखों से लगा लेना चाहिए।

श्लोक (12)- तयोच्चतररतस्यापि परिग्रहः।।
अर्थ : अगर पुरुष अश्व जाति का हो और स्त्री मृगी जाति की हो तो भी इन्द्राणि आसन के जरिये दोनों संभोग के चरम सुख पर पहुंच सकते हैं।

श्लोक (13)- संपुटेन प्रतिग्रहो नीचरते।।
अर्थ : नीचरत में स्त्री को अपनी योनि को सिकोड़ लेनी चाहिए।

श्लोक (14)- एतेन नीचतररतेऽपि हस्तिन्याः।।
अर्थ : ऐसे ही अगर हस्तिनी स्त्री शश जाति के पुरुष के साथ संभोग करती है तो उनके लिए सम्पुटक आसन अच्छा रहता है।
श्लोक (15)- संपुटकं पीडितकं वेष्टतकं वाडवकमिति।।
अर्थ : नीची जाति में संपुटक, पीड़ितक, वेष्टितक तथा वाडलक चार तरह के उपवेशन होते हैं।

श्लोक (16)- ऋजुप्रसारितावुभावप्युभयोश्र्चणाविति संपुटः
अर्थ : संभोग क्रिया के समय जब पति और पत्नी दोनों अपनी-अपनी टांगों को सीधे पसारकर मिलाते हैं तो उसे सम्पुटक कहते हैं।

श्लोक (17)- स द्विविधः पाश्र्चसंपुट उत्तानसंपुटश्र्च। तथा कर्मयोगात्।।
अर्थ- पार्श्वसम्पुट- उत्तानसम्पुट :
सम्पुटक दो तरह का होता है- पार्श्व सम्पुट तथा उत्तान सम्पुट। जब स्त्री और पुरुष करवट लेकर एक-दूसरे के सामने मुंह करके संभोग करते हैं तो उसे पार्श्व सम्पुट कहा जाता है। जब स्त्री बिल्कुल सीधी लेटी हो और पुरुष उसके ऊपर लेटकर संभोग करता है तो उसे उत्तान सम्पुट कहते हैं। अगर दोनों करवट लेकर संभोग करना चाहे तो ऐसे में पुरुष को दाईं तरफ लेटना चाहिए। संभोग करने की यह विधि हर तरह के पुरुषों और स्त्रियों के लिए समान है।

श्लोक (18)- पार्श्र्चेण तु शयानो दक्षिणेन नारीमधिशयीतेति सार्वत्रिकमेतत्।।
अर्थ : संभोग के समय पुरुष को स्त्री को अपनी बाईं तरफ सुलाना चाहिए।

श्लोक (19)- संपुटकप्रयुक्तयन्त्रेणैव दृढमूरू पीडयेदिति पीडितकम्।।
अर्थ- पीड़ितक :
संभोग करते हुए स्त्री-पुरुष जब सम्पुटक आसन का प्रयोग करते हैं तो वह एक-दूसरे की जांघों को बहुत जोर से दबाते हैं। इसे पीड़ितक कहते हैं।

श्लोक (20)- ऊरू व्यत्यस्येदिति वेष्टितकम्।।
अर्थ- वेष्टितक :
संभोग क्रिया के समय जब स्त्री अपनी योनि को सिकोड़ने के लिए एक जांघ को दूसरी जांघ पर रखती है तो उसे वेष्टितक कहते हैं।

श्लोक (21)-वडवेव निष्ठुरमवगृह्वियादिति वाडवकमाभ्यासिकम्।।
अर्थ- वाडवक :
जिस तरह से घोड़ी अपनी योनि के द्वारा घोड़े के लिंग को बहुत तेजी से कस लेती है उसी तरह से स्त्री अपनी योनि से पुरुष के लिंग को जकड़ लेती है तथा अलिंगन, चुंबन आदि करती है तो इस आसन को वाडवक कहा जाता है। इसके लिए खास तरह के अभ्यास की जरूरत होती है जिसमें वेश्याएं बहुत ज्यादा निपुण होती हैं।

श्लोक (22)- तदाऩ्घ्रीषु प्रायेण, इति संवेशनप्रकारा बाभ्रवीयाः
अर्थ : इस आसन को ज्यादातर आंध्रप्रदेश की स्त्रियां प्रयोग करती हैं।

सौवर्णनाभास्तु।।
इसके अंतर्गत महार्षि सुवर्णनाभ के विचार प्रकट कर रहे हैं।

श्लोक (23)- उभावप्युरू ऊर्ध्वाविति तद्धुग्नकम्।।
अर्थ-भुग्नक :
आचार्य सुवर्णनाभ का मानना है कि भुग्नक नाम का एक और आसन है जिसमें स्त्री अपनी दोनों जांघों को ऊपर तान देती है।

श्लोक (24)- चरणावूर्ध्व नायकोऽस्या धारयेदिति जृम्भितकम्।।
अर्थ- जृम्भितक :
जब पुरुष स्त्री की दोनों टांगों को अपने कंधों के ऊपर ऱख लेता है तो उसे जम्भितक कहा जाता है।

श्लोक (25)- तत्कुञ्चतावुत्पीडितकम्।।
अर्थ- पीड़ितक :
जिस समय बिल्कुल सीधी लेटी हुई स्त्री अपनी पसारी हुई टांगों को मोड़कर अपने ऊपर लेटे हुए पति की छाती के नीचे मोड़कर अड़ा लेती है और पुरुष छाती से उन्हें दबाकर संभोग करता है तो उसे उत्पीड़ितक कहते हैं।

श्लोक (26)- तदेकस्मिप्रसारितेऽर्धपीडितकम्।।
अर्थ- अर्धपीडितक।।
अपनी दोनों टांगों को फैलाकर लेटी हुई स्त्री जब अपनी एक टांग को मोड़कर पुरुष की छाती से लगाकर संभोग करती है तथा फिर उसे धीरे से फैलाकर अपनी दूसरी टांग को मोड़कर बारी-बारी से संभोग क्रिया कराती है तो उसे अर्ध पीडितक कहा जाता है।

श्लोक (27) -नायकस्यांस एको द्वितीयकः प्रसारित इति पुनः पुनर्व्यत्यासेन वेणुदारितकम्।।
अर्थ- वेणुदारितक :
जब लेटी हुई स्त्री अपने ऊपर लेटे हुए पुरुष के कंधे पर एक टांग रखती है तथा फिर पहली टांग को फैलाकर दूसरी टांग को पुरुष के दूसरे कंधे पर ऱखकर संभोग करती है तो उसे वेणुदारितक कहते हैं।

श्लोक (28)- एकः शिरस उपरि गच्छेद्वितीयः प्रसारित इति शूलाचितक- माभ्यासिकम्।।
अर्थ- शूलाचितक :
स्त्री जिस समय अपनी एक टांग को पुरुष के सिर पर ऱखकर और दूसरी टांग को फैलाकर संभोग करती है तथा फिर दूसरी टांग को सिर पर रखकर पहली टांग को फैलाकर संभोग क्रिया करती है तो उसे शूलाचितक कहा जाता है। यह आसन भी लगातार अभ्यास करने से सफल होता है।

श्लोक (29)- संकुचितौ स्वस्तिदेशो निदध्यादिति कार्कटकम्।।
अर्थ- कार्कटक :
जिस तरह से केकड़ा अपने पैरों को पूरी तरह से सिकोड़ लेता है उसी तरह से स्त्री भी लेटकर अपनी टांगों को सिकोड़कर पुरुष की नाभि में लगाकर जब संभोग क्रिया करती है तो उस आसन को कार्कटक कहते हैं।

श्लोक (30)- ऊर्ध्वावूरू व्यत्स्येदिति पीडितकम्।।
अर्थ- पीडितक :
संभोग क्रिया के समय जब स्त्री अपनी एक जांघ को दूसरी जांघ से बहुत तेजी से दबाती है तो उस आसन को पीड़ितक कहते हैं।

श्लोक (31)- जङघाव्यत्यासेन पद्मासनवत्।।
अर्थ- पद्मासन :
पलंग पर लेटी हुई स्त्री जब अपने बाएं पैर को दाएं पैर के जोड़ में और दाएं पैर को बाएं पैर के जोड़ में रखकर संभोग क्रिया करती है तो उसे पद्मासन कहते हैं।

श्लोक (32)- पृष्ठे परिष्वजमानायाः पराङ्मुखेण परावृत्तकमाभ्यासिकम्।।
अर्थ- परावृत्तक :
स्त्री और पुरुष जब मजबूत अलिंगन में जकड़कर आमने-सामने बैठकर संभोग क्रिया करते है तो संभोग के समय में ही थोड़ी देर के बाद अलिंगनबद्ध अवस्था में ही पुरुष को स्त्री के पीछे घूम जाना चाहिए और संभोग करते रहना चाहिए। इसे परावृत्तक आसन कहते हैं। यह आसन बहुत ही कठिन होता है और इसके लिए लंबे अभ्यास की जरूरत होती है।

श्लोक (33)- जले च संविष्टोपविष्यस्थितात्मकाश्र्चित्रान्योगानुपलक्षयेत्। तथा सुकरत्वादिति सुवर्णनाभः।।
अर्थ- जलसंयोग :
आचार्य सुवर्णनाभ का कहना है कि पानी में भी खड़े होकर, बैठकर, लेटकर आदि कई तरह के आसनों के द्वारा संभोग क्रिया की जा सकती है। जमीन से ज्यादा पानी में संभोग करना बहुत अच्छा रहता है।

श्लोक (34)- वार्त तु तत्। शिष्टैरपस्मृतत्वादिति वात्स्यायनः।।
अर्थ : आचार्य वात्सायन पानी में संभोग क्रिया करने का विरोध करते हैं। वह कहते हैं शिष्टों, आचार्यों द्वारा पानी में संभोग करना गलत माना जाता है।

श्लोक (35)- अथ चित्ररतानि।।
अर्थ- चित्रण प्रकरण :
इसके अंतर्गत संभोग क्रिया करने की बहुत ही अदभुत विधियां बताई जाती हैं।

श्लोक (36)- ऊर्ध्वस्थितयोर्यूनोः परस्परापाश्रययोः कुडयस्तम्भापाश्रितयोर्वा स्थितरतम्।।
अर्थ : जब स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के सहारे खड़े होकर या फिर दीवार आदि का सहारा लेकर संभोग क्रिया करती हैं तो उसे स्थिरता कहा जाता है।

श्लोक(37)-कुडयापाश्रितस्य (कण्ठावसक्तबाहुपाशायास्तद्धस्तपञ्ञरोपविष्टाया) ऊरुपाशेन जघनमभिवेष्टयन्त्या कुड्ये चरणक्रमेण वलन्त्या अवलम्बितकं रतम्।।
अर्थ- अवलम्बितक :
जब पुरुष दीवार की आड़ लेकर खड़ा हो तथा अपने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में जोड़कर पत्नी को बैठा लें तथा पत्नी अपने दोनों हाथों से पति की गर्दन को पकड़कर अपनी दोनों टांगों को दीवार पर टिका दे और झूलती अवस्था में संभोग क्रिया करे तो उसे अवलम्बितक आसन कहते हैं।

श्लोक (38)- भूमौ वा चतुष्पदवदास्थिताया वृषलीलयावस्कंदनं धेनुकम्।।
अर्थ- धेनुक :
जिस समय स्त्री अपने दोनों हाथ और पैरों को जमीन पर टिकाकर जानवर की तरह आसन बनाकर खड़ी हो जाए और पुरुष उसके पीछे से संभोग क्रिया करे तो उसे धेनुक आसन कहते हैं।

श्लोक (39)- तत्र पृष्ठमुरः कर्माणि लभते।।
अर्थ : धेनुक आसन में छाती के बदले पीठ को दबाया जाता है।

श्लोक (40)- एतेनैव योगेन शौनमैणेयं छागलं गर्दभाक्रान्तं मार्जारलिलितकं व्याघ्रावस्कन्दनं गजोपमर्दित वराहघृष्टकं तुरगाधिरूढकमिति यत्र-यत्र विशेषो योगोऽपूर्वस्तत्तहुपलक्षयेत्।।
अर्थ : जिस तरह से जानवर संभोग करने के लिए जोर लगाता है उसी तरह संभोग क्रिया के समय स्त्री और पुरुष को भी कोशिश करनी चाहिए जैसे स्त्री के ऊपर चढ़ना, स्त्री को रौंदना, जोर से आवाज निकालना, धक्के मारना। इस तरह से संभोग करने से संभोग के नए-नए तरीकों के बारे में पता चलता है।

श्लोक (41)- मिश्रीकृतसद्धावाभ्यां द्वाभ्यां सह संघाटकं ग्तम्।।
अर्थ :  जब आपस में अच्छा संबंध ऱखने वाली दो स्त्रियों के साथ पुरुष संभोग करता है तो इस आसन को संघाटक कहते हैं।

श्लोक (42)- बह्मीभिश्र्च सह गोयूथिकम्।।
अर्थ- गोयूथिक :
जब बहुत सारी स्त्रियों के साथ इस तरह की संभोग क्रिया की जाती है तो उसे गोयूथिक कहते हैं।

श्लोक (43)- बारिक्रीडितकं छागलमैणेयमिति तत्कर्मानुकृतियोगात्।।
अर्थ : जिस तरह से बकरा-बकरी, हिरन-हिरनी संभोग क्रिया करते हैं या हाथी और हथिनी जलक्रीड़ा करते हैं उसी तरह से गोयूथिक आसन को कई तरह से किया जाता है।

श्लोक (44)- ग्रामनारीविषये स्त्रीराज्ये च बाह्मीके बहवो युवानोऽन्तः पुरसधर्माण एकैकस्याः परिग्रहंभूताः।।
अर्थ : पहाड़ी देश ग्राम नारी नागा देश में और बह्यीकर में अन्तःपुरवासिनी स्त्रियां अपने शयनकक्ष में बहुत से पुरुषों को छुपाकर रखती हैं।

श्लोक (45)- तेषामेकैकशो युगपच्च यथासात्म्यं यथायोगं य रञ्ञयेयः।।
अर्थ : उन स्त्रियों के द्वारा छुपाए गए वह युवक अकेले या कई और युवकों के साथ मिलकर उनकी संभोग की इच्छा को पूरा करते हैं।

श्लोक (46)- एको धारयेदेनामन्यो निषेवेत। अन्यो जघनं मुखमन्यो मध्यमन्य इति वारं वारेण व्यतिकरेण चानुतिष्ठेयुः।।
अर्थ : एक युवक उस अन्तःपुरवासिनि स्त्री को गोद में बिठाता है, दूसरा दांतों और नाखूनों को उसके शरीर में गड़ाता है, तीसरा उससे संभोग करता है, चौथा मुंह को चूमता है, पांचवां उसके स्तनों में दांतों को गड़ाता है। इसी तरह से बारी-बारी करके सारे युवक तब तक उस स्त्री के साथ संभोग करते रहते हैं जब तक कि वह स्त्री पूरी तरह से संभोग क्रिया के चरम सुख को नहीं पा लेती है।

श्लोक (47)- एतया गोष्ठीपरिग्रहा वेश्या राजयोषापरिग्राहश्र्च व्याख्यातः।।
अर्थ : इस तरह के मिलकर संभोग करने का सुख ज्यादातर वेश्याएं ही लिया करती हैं। कभी-कभी राजाओं की स्त्रियां भी इस तरह का संभोग सुख पाने के लिए अपने यहां किसी युवक को रख लिया करती थी।

श्लोक (48)- अधोरतं पायावपि दाक्षिणात्यानाम्। इति चित्ररतानि।।
अर्थ : सबसे ज्यादा बुरी संभोग क्रिया गुदामैथुन होती है। गुदामैथुन ज्यादातर दक्षिण भारत में मशहूर है।

श्लोक (49)- पुरुषोपसृप्तकानि पुरुषायिते वक्ष्यामः।।
अर्थ : पुरुष को स्त्री के करीब पहुंचने के और उसे आकर्षित करने के लिए क्या करना क्या चाहिए। यह पुरुषायित्व प्रकरण के अंतर्गत आता है।

श्लोक (50)- भवतश्र्चात्र श्लोकों-
पशूनां मृगजातीनां पतग्ङानां च विभ्रमैः। स्तैरूपायैश्रच्यित्तज्ञो रतियोगान्विवर्धयेत्।।
अर्थ : इसके अंतर्गत दो श्लोक प्रसिद्ध है-
पुरुष को चाहिए कि वह पशु-पक्षियों तथा जानवरों की तरह संभोग करने की कलाओं को सीखकर उनका प्रयोग स्त्री के साथ करके उसके प्यार और आकर्षण को बढ़ाना चाहिए।

श्लोक (51)- तस्सात्म्याद्देशसात्म्याच्च तैस्तैर्भावैः प्रयोजितैः। स्त्रीणां स्नेहश्र्च रागश्र्च बहुमानश्र्च जायते।।
अर्थ : जो पुरुष स्त्री की इच्छा के मुताबिक देशाचार के मुताबिक और समयोचित भावनाओं के अनुसार संभोग क्रिया में निपुण होता है। स्त्रियां उस पर ज्यादातर स्नेह रखती हैं और वह पुरुष के द्वारा ज्यादा सम्मानित होता है।

आचार्य वात्स्यायन का अमानुषिक, अप्राकृतिक क्रियाओं के बारे में बताने का अर्थ क्या रहा होगा- यह जानने की इच्छा ज्यादातर हर कामसूत्र पढ़ने वाले के मन में होती है।
कोई भी शास्त्र एकदेशीय नहीं होता है बल्कि वह तो समष्टि का बोधक, प्रतिपादक और समर्थक होता है। उसके अंदर अपने विषय का अखंड, परिपूर्णँ चित्रण और पूरी जानकारी रहती है। वह अपने बारे में दिए जा रहे विषय के हर पहलू की यथार्थ व्याख्या करता है। उसका यह कोई मकसद नहीं है कि वह अच्छा है और यह बुरा।
अच्छाई और बुराई का विश्लेषण, निराकरण करना तो उन लोगों की इच्छा और बुद्धि पर निर्भर करता है जो लोग शास्त्र को पढ़कर या सुनकर उसमें बताए गए सिद्धांतों पर चलना चाहते हैं। शास्त्र लिखने वाला सावधान जरूर कर देता है कि यह सिद्धान्त या रास्ता मुश्किल है, शिष्टजन सम्मत है या सिर्फ परिचय चारूता बढ़ाने के लिए सिर्फ पढ़ने के लिए उपयोगी है।
इस अध्याय में आचार्य वात्स्यायन ने यह साफ कर दिया है कि चित्ररत संभोग करना गलत है।
श्लोक- इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे सांप्रयोगिके द्वितीयेऽधिकरणे संवेशनप्रकाराञ्ञित्ररतानि च षष्ठोध्यायः।
षष्ठम अध्याय-संवेशन प्रकरण : संभोग क्रिया आसन षष्ठम अध्याय-संवेशन प्रकरण : संभोग क्रिया आसन Reviewed by Admin on 10:31 AM Rating: 5

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