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द्वितीय अध्याय (नष्टरागप्रत्यानयन प्रकरण)

श्लोक-1. चण्डवेगां रञ्जयितुमशक्नुवन्योगानाचरेत्।।1।।


अर्थ- प्रचंड वेग वाली स्त्री को अनुरक्त तथा खुश करने में असमर्थ पुरुषों की योगों (औषधि-साधन) का प्रयोग करना चाहिए।

श्लोक-2. रतस्योपक्रमे संबाधस्य करेणोपमर्दनं तस्या रसप्राप्तिकाले च रतयोजनमिति रागप्रत्यानयनम्।।2।।

अर्थ- सेक्स के दौरान स्त्री से पहले स्खलित हो जाने वाला पुरुष यदि स्त्री से खोए हुए अनुराग को फिर से प्राप्त करना चाहता है तो सेक्स करने से पहले उसे स्त्री की योनि में अंगुली डालना चाहिए। फिर सेक्स करना चाहिए ऐसा करने के बाद ही संभोग करें।

श्लोक-3. औपरिष्टकं मंदवेगस्य गतवयसो व्यायतस्य रतश्रान्तस्य च रागप्रत्यानयनम्।।3।।

अर्थ- यदि किसी व्यक्ति की सेक्स इन्द्रिय बिल्कुल ही शिथिल पड़ गयी हो, वृद्धावस्था अथवा अधिक मोटापन आ गया हो। या सेक्स करते-करते वह थक गया हो, तो उसे चाहिए कि साम्प्रयोगिक अधिकरण में बताई गयी औपरिष्टक विधि से वह उत्तेजना प्राप्त करे।

श्लोक-4. अपद्रव्याणि वा योजयेत्।।4।।

अर्थ- या वह रबड़, लकड़ी आदि के बने हुए कृत्रिम साधनों का प्रयोग करे।

श्लोक-5. तानि सुवर्णारजतताम्रकलायसगजदंतगवद्रव्यमयाणि।।5।।

अर्थ- इस तरह के कृत्रिम साधन सोना, चांदी, तांबा, लोहा, हाथीदांत तथा सींग से बनाये जाते हैं।

श्लोक-6. त्रापुषाणि सैसकानि च मृदून शीतवीर्याणि कर्मणि च धृष्णूनि भवन्तीत बाभ्रवीया योगाः।।6।।

अर्थ- वाभ्रवीय आचार्यों का कहना है कि सीसा और रांग से बने हुए कृत्रिम साधन (लिंग), कोमल, ठंडे तथा संघर्षशील होते हैं।

श्लोक-7. दारुमयानि साभ्यतश्रेति वात्स्यायनः।।7।।

अर्थ- आचार्य वात्स्यायन कहते हैं कि यदि किसी स्त्री लकड़ी के बने हुए कृत्रिम साधन (कृत्रिम लिंग) का भी प्रयोग किया जा सकता है।

श्लोक-8. लिंगप्रमाणान्तरं बिन्दुभिः कर्कशपर्यंत बहुलं स्यात्।।8।।

अर्थ- पुरुष के लिंग के नाप का ही कृत्रिम साधन (कृत्रिम लिंग) होना चाहिए। स्त्री की योनि की खुजलाहट मिटाने के लिए उस कृत्रिम साधन का आगे वाला खूब गोदवा लेना चाहिए।

श्लोक-9. एते एव द्वे संघाटी।।9।।

अर्थ- कृत्रिम साधनों में जोड़ या फिर उतार-चढ़ाव होना आवश्यक होता है।

श्लोक-10. त्रिप्रभृति यावत्प्रमाणं वा चूडकः।।10।।

अर्थ- पुरुष को लिंग के आयाम खरगोश से लेकर घोड़े तक के बताये गये हैं। उसी के समान कृत्रिम साधन ,चूड़क, कहा जाता है।

श्लोक-11. एकामेव लतिकां प्रमाणवशेन वेष्टयेदित्येकचूडकः।।11।।

अर्थ- जो अपने आयाम के अनुसार शीशा आदि की बनी हुई एक ही लता को लपेट सके। वह कृत्रिम साधन, एकचूड़क, कहलाता है।

श्लोक-12. उभयतोमुखच्छिद्रः स्थूलकर्कशवृषमगुटिकायुक्तः प्रमाणवशयोगी कटय्यां बद्धं कञ्जको जालकं वा।।12।।

अर्थ- जिस कृत्रिम साधन (कृत्रिम लिंग) में अंडकोष भी लगे हो, जिसमें दोनों ओर छेद किये गये हों जो कमर से बांधा जा सके तथा जिसकी लंबाई और मोटाई अनुपात के अनुसार हो उसे कंचुक अथवा जालक कहते हैं।

श्लोक-13. तदभावेऽलाबूनालकं वेणुश्च तैलकषायैः सुभावितः सूत्रेण कटयां बद्घः लक्षणा काष्ठमाला वा ग्रथिता बहुभिरामलकास्थिभिः संयुक्तेत्यपविद्धयोगाः।।13।।

अर्थ- यदि इस तरह के कृत्रिम साधन (कृत्रिम लिंग) न मिल सके तो

श्लोक-14. न त्वविद्धस्य कस्यचिद्वयवहृतिरस्तीति।।14।।

अर्थ- इस प्रकार कृत्रिम लिंगों का संबंध किसी सेक्स से नहीं है। ये सभी नपुंसकों के लिए योग हैं।

श्लोक-15. दाखिणात्यानां लिंगस्य कर्णयोरिव व्यधनं बालस्य।।15।।

अर्थ- दक्षिण भारतीय लोगों में बचपन में ही कान की तरह लिंग का भी छेद होता है।

श्लोक-16. युवा तु शस्त्रेण च्छेदयित्वा यावद्रुधिकरस्यागमनं तावदुदके तिष्ठेत्।।16।।

अर्थ- युवा व्यक्ति यदि अपने लिंग में छेद करना हो तो उसे लिंग के ऊपर का चमड़ा सरकाकर नसों को बचाकर किसी तेज हथियार से कुशलतापूर्वक तिरछा छेद करें तथा जब तक खून बहे तब तक लिंग को पानी में डुबोयें रखें।

श्लोक-17. वैशद्यार्थ च तस्यां रात्रौ निर्बन्धाद्वयवायः।।17।।

अर्थ- यदि लिंग के छेद को अधिक बड़ा बनाना हो तो उसी रात कई बार सेक्स करना चाहिए।

श्लोक-18. ततः कषायैरेकदिनारितं शोधनम्।।18।।

अर्थ- इसके बाद पंचकषायों (अमलतास, ब्राह्मी, कनेर, मालवी, शंखपुष्पी) के रस से एक-एक दिन करके लिंग को धोना चाहिए।

श्लोक-19. वेतसकुटजसंकभिः क्रमेण वर्धमानस्य वर्धनैर्बन्धनम्।।19।।

अर्थ- वेष तथा केसरया के कीलों द्वारा धीरे-धीरे करके लिंग के छेद के आकार को बढ़ाना चाहिए।

श्लोक-20. यष्टीमधुकेन मधुयुक्तेन शोधनम्।।20।।

अर्थ- घावों को भरने के लिए मुलहठी के चूर्ण में शहद मिलाकर लेप करें।

श्लोक-21. ततः सीसकपत्रकर्णिकया वर्धयेत्।।21।।

अर्थ- फिर शीशम की पत्तियां लिंग के छेद पर बांधनी चाहिए। इससे छेद का आकार बड़ा हो जाता है।

श्लोक-22. म्रक्षेयद्भल्लातकतैलेनेति व्यधनयोगा।।22।।

अर्थ- शीशम की पत्तियां बांधने के बाद इसे भिलावां के तेल से भिगोते रहने से लिंग के छेद का आकार बड़ा हो जाता है। व्यवधन योग पूरे होते हैं।

श्लोक-23. तस्मिन्ननेकाकृतिविकल्पान्यपद्रव्याणि योजयेत्।।23।।

अर्थ- जब लिंग का आकार बड़ा हो जाए तो, घाव भी भर जाए, पीड़ा भी बाकी न रहे तब उसमें हड्डी, लकड़ी मिट्टी पत्थर आदि के लम्बे अभवा गोल अपद्रव्य पहना देना चाहिए।

श्लोक-24. वृत्तमेकतो वृत्तमुद्खलकं कुसुमके कण्टकितं कंकास्थि गजकरमष्टमणडलकं भ्रमरकं शृंगाटकमन्यानि वोपायतः कर्मतश्च बहुकर्मसहता चैषां मृदुकर्कशता यथासात्यमित नष्टरागप्रत्यानयनं द्विषष्टितमं प्रकरणम्।।24।।

अर्थ- जिस प्रकरा का अपद्रव्य जिसे अनुकूल पड़े, उस तरह का गोल, चपटा, ओखली जैसा, कमल, करेला जैसा कांटेदार, हौज के समान, हाथी की सूंड़ की तरह चक्करदार सिंघाड़ें के आकार का कोमल अथवा कठोर बनाया जा सकता है। नष्ट हुए रोग को सिर से लाने की विधियां 62वां प्रकरण समाप्त हुआ।

श्लोक-25. एवं वृक्षजानां जन्तूनां शूकेरुपहितं लिंगं दशरात्रं तैलेन मृदितं पुनरुपतृहितं पुनः प्रमृदितमिति जातशोफं खट्वायामधोमुखस्तदंते लम्बयेत।।25।।

अर्थ- इस प्रकार पेड़ों में उत्पन्न होने वाले जन्तुओं का रोम लिंग पर लेप करें तथा तेल की मालिश करें। यही प्रक्रिया लगातार 10 रात तक करने के बाद जब लिंग में सूजन आ जाए तो चारपाई के छेद में लिंग को डालकर पेट के बल सो जाएं।

श्लोक-26. तत्र शीतैः कषायैः कृतवेदनानिग्रहं सोपक्रमेण निष्पादयेत्।।26।।

अर्थ- इसके बाद उन्हें लेप लगाकर पीड़ा तथा जलन मिटाना चाहिए।

श्लोक-27. स यावज्जीवं शूकजो नाम शोफो विटानाम्।।27।।

अर्थ- इस प्रकार कामुक विलासियों के लिंग की मोटाई उनके पूरे जीवन भर बनी रहती है।

श्लोक-28. अश्वगंधाशबरकंदजलशू कबृ हतीफलमाहिष नवनीतहस्तिकर्णवज्रवल्लीरसैरेकैकेन परिमर्दनं मासिक वर्धनम्।।28।।

अर्थ- असगंध, बड़े लोध की जड़ जलशंकु (एक जंतु), बड़ी भटकटैया (कटेरी) के पके हुए फल, मक्खन, छिउल (ढाक) के पत्ते तथा हरजोर का रस- इनमें से किसी एक को लगाने से एक महीने तक लिंग मोटा बना रहता है।

श्लोक-29. एतैरेव कषायैः पक्वेन तैलेन परिमर्दनं पाषाणमास्यम्।।29।।

अर्थ- असगंध आदि की लुगदी से साबित हुए तेल की मालिश करने से 6 महीने तक लिंग के आकार में वृद्धि रहती है।

श्लोक-30. दाड़िमत्रापुषवीजानि बालुका बृहतीफलरस्त्रेति मृद्वग्निना पक्वेन तैलेन परिमर्दनं परिषेको वा।।30।।

अर्थ- अनार , बालमखीरा के बीज, एडबालुक (एलवा) तथा भटकटैया के फलों के रस का धीमी आंच से तेल निकालकर लिंग में मालिश करने से 6 महाने तक लिंग के आकार में वृद्धि होती रहती है।

श्लोक-31. तास्तांत्र योगानाप्तेभ्यो बुध्येतेति वर्धनयोगाः।।31।।

अर्थ- इनके अलावा लिंग वृद्धि के अन्य योग जो हैं, उन्हें इस विषय में प्रामाणिक व्यक्तियों को समझना चाहिए। वर्द्धन योग नाम का 63वां प्रकरण समाप्त।

श्लोक-32. अथस्नूहीकण्टकचूर्णेः पुनर्नवावानरपूरीषलांगलिका-मूलामिश्रैर्यामवकिरेत्सा नान्यं कामयेत्।।32।।

अर्थ- थूहर के कांटों का चूर्ण, पुनर्नवा (पथरचटा या गदापुन्ना), बंदर की बीट, कलिहारी (इन्द्रायन) की जड़- सभी को पीसकर चूर्ण बना लें तथा फिर उस चूर्ण को जिस भी स्त्री के सिर पर डाल दें। वह स्त्री वशीभूत हो जाती है।

श्लोक-33. तथा सेमलताऽवल्गुजाभृंगलोहोपजिह्वकाचूर्णैर्व्याधिघातक जम्बूफलरसनिर्यासेन घनीकृतेन च लिप्तसंबाधां गच्छतो रागो नश्यति।।33।।

अर्थ- उसी तरह सोमलता बकुची, भंगरैया, लौह भस्म, उपजिह्वका (गराज- जो बरसात में बाबी के आस-पास उत्पन्न होती है) का चूर्ण और अमलतास तथा जामुन के फल की गुठली खरल करके योनि में लेप करने से भी जो पुरुष उस स्त्री से सेक्स करता है। उसकी आसक्ति समाप्त हो जाती है या उस पुरुष की इन्द्रिय की उत्तेजना समाप्त हो जाती है।

श्लोक-34. गोपालिका बहू पादिकाजिह्वकाचूर्णैर्माहिषतक्रयुक्तैः स्त्रातां गच्छतो रागो नश्यति।।34।।

अर्थ- गोपालिका, बहुपालिका तथा जिह्विका का चूर्ण भैंस के मट्ठे में मिलाकर स्नान करने वाली स्त्री से जो पुरुष सेक्स करता है। वह राग हो जाता है।

श्लोक-35. नीपाम्रातकजम्बूकूसुमयुक्तमनुलेपनं दौर्भाग्यकरं स्त्रजश्च।।35।।

अर्थ- कदम्ब, आंवड़ा तथा जामुन के फूलों को घिसकर चंदन लगाना अथवा इन फूलों की माला पहनना दुर्भाग्य का वर्धक होता है।

श्लोक-36. कोकिलाक्षप्रलेपो हस्तिन्याः संहतमेकरात्रे करोति।।36।।

अर्थ- तालमखाना को पानी में पीसकर योनि में लेप करने से हस्तिनी स्त्री की योनि सिकुड़कर मृगी स्त्री की तरह छोटे आकार की बन जाती है।

श्लोक-37. पद्योत्पलकदम्बसर्जकसुगंधचूर्णानि मधुना पिष्टानि लेपो मृगया विशालीकरणम्।।37।।

अर्थ- कमलगट्टा, नीलोफल, कदम्ब, विजयसार तथा नेत्रबाला का चूर्ण शहद के साथ घोटकर उसका लेप बनाया जाए तो, फिर उस लेप को योनि में लगायें, इससे छोटी सी छोटी आकार की योनि गहरी तथा विशाल बन जाती है।

श्लोक-38. स्नूहीसोमार्कक्षारवल्गुजाफलैर्भावितान्यामलकानि केशानां श्र्तीकरणम्।।38।।

अर्थ- थूहर, पुतली तथा मदार के पत्तों को जलाकर राख बना लें। फिर उस राख के साथ गुरुची के बीज तथा आंवलों को उबालकर उसे बालों में लगाने से काले से काले बाल सफेद हो जाते हैं।

श्लोक-39. मदयन्तिकाकुटजकाञ्जनिकागिरिकर्णिकालक्ष्यपर्णीमूलैः स्नानं केशानां प्रत्यानयनम्।।39।।

अर्थ- मेंहदी, केसरिया, पहाड़ी, चमेली, माषपर्णी की जड़ का चूर्ण सिर पर मलकर नहाने से सिर से सफेद बाल जड़ से काले हो जाते हैं।

श्लोक-40. एतैरेव सुपक्केन तैलेनाभ्यांगत्कृष्णीकरणात् क्रमेणास्य प्रत्यानयनम्।।40।।

अर्थ- इन्हीं से बनाये गये तेल से भी उपरोक्त बाल काले हो जाते हैं।

श्लोक-41. श्रेताश्रस्य मुषकस्वेदैः सप्तकृत्वो भावितेनालक्तकेनरोऽघरः श्र्वेतो भवति।।41।।

अर्थ- सफेद घोड़े के अंडकोष के पसीने की इन्हीं दवाओं के साथ सात बार उबालने पर जो योग प्राप्त होता है, वह सफेद होंठों को शीघ्र ही लाल बना देता है।

श्लोक-42. मदयन्तिकादीन्येव प्रत्यानयनम्।।42।।

अर्थ- इन्हीं दवाओं को पीसकर फिर होंठों में लगाने से लाल होंठ सफेद हो जाते हैं।

श्लोक-43. बहुपादिकाकुष्ठतगरतालीसदेवदारुवज्रकंदकैरुपलिप्तं। वंशं वादयतो या शब्दं श्रृणोति या वश्या भवति।।43।।

अर्थ- बहुपादिका, कुण्ठ, तगर, लाली शपत्र, देवदारू तथा वूजकंद का लेप बाहों पर करके उस बांस की बांसुरी बनाकर बजाने से जो स्त्री उसकी ध्वनि सुनती है वह बजाने वाले पर मोहित हो जाती है।

श्लोक-44. धत्तूरफलयुक्तोऽभ्यवहार उन्मादकः।।44।।

अर्थ- पेय पदार्थों में धतूरे के बीजों को मिलाकर जिसे भी पिला दें अथवा खिला दें वह पागल हो जाता है।

श्लोक-45. गुड़ो जीर्णतश्च प्रत्यानयनम्।।45।।

अर्थ- पुराना गुड़ खिला देने से धतूरे का विष उतर जाता है।

श्लोक-46. हरितालमनः शिलाभक्षिणो मयूरस्य पुरीषेण लिप्तहस्तो यद्द्रव्यं स्पृशति नत्र दृश्यते।।46।।

अर्थ- हरताल तथा मैनसिल खाने वाले मोर के बीट को हाथों में लेकर जिस भी चीज को छू लेंगे। वह वस्तु दूसरों को नहीं दिखाई देती है।

श्लोक-47. अंगारतृणभस्कमना तैलेन विमिश्रमुदकं क्षीरवर्ण भवति।।47।।

अर्थ- खस की राख तेल में मिलाकर पानी में डालने से पानी दूध के समान सफेद रंग का हो जाता है।

श्लोक-48. हरीतकाम्रातकयोः श्रवणप्रियंगकाभिश्च पिष्टाभिर्लिप्तानि लोहभाण्डानि ताम्रीभवन्ति।।48।।

अर्थ- हरड़ तथा आंवला को मालकांगनी के साथ पीसकर लोहे के बर्तन पर लेप करने से वह तांबे के रंग का हो जाता है।

श्लोक-49. श्रवणप्रियंगुकातैलेन दुकूलसर्पनिर्मोकेण वर्त्त्या दीपं प्रज्वाल्य पार्श्वे दीर्घीकृतानि काष्ठानि सर्पवद् दृश्यंते।।49।।

अर्थ- सांप की केंचुली से मालकांगुनी पीसकर लेप करें और उसमें कपड़ा लपेटकर बत्ती बना लें, फिर यदि उसे जलाएं तो आसपास की लकडि़या उसकी रोशनी से सांप के समान प्रतीत होती हैं।

श्लोक-50. श्र्वेतायाः श्र्वेतवत्सायाः गोः क्षीरस्य पानं यशस्यमायुष्यम्।।50।।

अर्थ- सफेद बछड़े वाली गाय का दूध पीने से यश तथा आयु की वृद्धि होती है। चित्रयोग नाम का 64वां प्रकरण समाप्त होता है।

श्लोक-51. ब्राह्मणानां प्रशस्तानामाशिषः।।51।।

अर्थ- प्रशस्त ब्राह्मणों के आशिर्वाद से भी आयु तथा यश में वृद्धि होती है।

श्लोक-52. पूर्वशास्त्राणि संदृश्य प्रयोगाननुसृत्य च। कामसूत्रमिदं यत्नात्संक्षेपेण निवेदितम्।।52।।

अर्थ- पूर्व आचार्यों के शास्त्रों को एकत्र करके, उनका अध्ययन और उनके प्रयोगों का परीक्षण करके बड़े प्रयत्न से सारांश में कामसूत्र को कहा गया है।

श्लोक-53. धर्ममर्थं च कामं च प्रत्ययं लोकमेव च। पश्यत्येतस्य तत्तज्ञो न च रागात्प्रवर्तते।।53।।  

अर्थ- कामसूत्र के तत्व को भली प्रकार समझने वाले लोग धर्म, काम, आत्मविश्वास तथा लोकाचार को देखते हुए प्रवृत्त होते हैं न कि प्रेम अथवा मुक्ता से

श्लोक-54. अधिकारवशादुक्ता ये चित्रा रागवर्द्धनाः। चदन्तरमत्रैव ते यत्नाद्विनिवारिताः।।54।।

अर्थ- इस शास्त्र में अच्छी तथा सभी बुरी बातें दी गयी हैं तथा अंत में यह बता दिया गया है, कौन-सी बात की जाए तथा कौन-सी न की जाए।

श्लोक-55. न शास्त्रमस्तीत्येतेन प्रयोगो हि समीक्ष्यते। शास्त्रार्थान्व्यापिनो विद्यात्प्रयोगांस्त्वैकदेशिकान्।।55।।

अर्थ- जितनी बातें शास्त्रों में बताई गयी हैं वे सभी प्रयोग के लिए नहीं हैं, शास्त्र का व्यापक सार्वभौम होता है लेकिन इसके प्रयोग एकदेशी होते हैं।
द्वितीय अध्याय (नष्टरागप्रत्यानयन प्रकरण) द्वितीय अध्याय (नष्टरागप्रत्यानयन प्रकरण) Reviewed by Admin on 10:22 AM Rating: 5

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