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प्रथम अध्याय : सहायगम्यागम्यगमन कारणचिन्ता प्रकरण

श्लोक-1. वेश्यानां पुरुषाधिगमे रतिर्वृत्तिश्च सर्गात्।।1।।


अर्थः वेश्याओं में धन के प्रति आकर्षण तथा संभोग की प्रकृति जन्मजात होती है।

श्लोक-2. रतितः प्रवर्तनं स्वाभाविकं कृत्रिममर्थार्थम्।।2।।

अर्थः वेश्याओं का धन के प्रति आकर्षण कृत्रिम होता है और सेक्स की प्रवृत्ति स्वाभाविक होती है।

श्लोक-3. तदपि स्वाभाविकवद्रूपयेत्।।3।।

अर्थः वेश्या जहां पर बनावटी प्रेम दिखाती हैं, वह स्वाभाविक ही प्रतीत होता है।

श्लोक-4. कामपरासु हि पुंसां विश्वासयोगात्।।4।।

अर्थः सेक्स करने की इच्छा जिस स्त्री में होती है, आमतौर पर पुरुष उसी स्त्री के प्रति अधिक आकर्षित होते हैं।

श्लोक-5.  अलुब्धतां च ख्यापयेत्तस्य निदर्शनार्थम्।।5।।

अर्थः वेश्याएं पुरुष को आकर्षित करने के लिए निर्लोभी बनने का दिखावा करती हैं।

श्लोक-6. न चानुपायेनार्थान् साधयेदायतिसंरक्षणार्थम्।।6।।

अर्थः अपना प्रभाव बनाये रखने के लिए वेश्याओं को अधिक से अधिक धन कमाने के लिए प्रयास करना चाहिए।

श्लोक-7. नित्यमलंकारयोगिनी राजमार्गावलोकिनी दृश्यमाना न चातिविवृता तिष्ठेत्। पण्यसधर्मत्वात्।।7।।

अर्थः वेश्या स्त्री हर समय श्रृंगार किये रहे तथा सड़क पर आने-जाने वाले लोगों को देखती रहे। उसे ऐसी जगह पर बैठना चाहिए कि लोग आसानी से देख सके, लेकिन उसे बिल्कुल निर्वस्त्र होकर नहीं बैठना चाहिए क्योंकि वेश्यावृत्ति भी बाजार में बिकने वाली वस्तुओं के समान है।

श्लोक-8. यैर्नायकमावर्जयेदन्याभ्याश्चावच्छिन्द्यादात्मनश्चानर्थं प्रतिकुर्यादर्थं च साधयेत्र च गम्यैः परिभूयेत तान् सहायान् कुर्यात्।।8।।

अर्थः वेश्या को उसी व्यक्ति को अपनी सहायता करने वाला बनाना चाहिए, जो उसके प्रेमी को उसकी ओर आकर्षित कर सके तथा उस पर आये हुए संकट को दूर कर सके। यदि वेश्या के साथ सेक्स करने वाला व्यक्ति उसका शोषण करना चाहे तो सहायता करने वाला व्यक्ति उसकी मदद कर सके जिससे उसका शोषण न हो।

श्लोक-9. ते त्वारक्षकपुरुषा धर्माधिकरणस्था दैवज्ञा विक्रान्ताः शूराः समानविद्याः कलाग्राहिणः पीठमर्दविटविदूषकमालाकारगान्धिक-शौण्डिकरजकनापितभिक्षकास्ते च ते च कार्ययोगात्।।9।।।

अर्थः शासनाधिकारी, वकील, ज्योतिषी, साहसी, मालाकार, गन्धी, शराब के विक्रेता, नाई, धोबी, भिखारी और अन्य ऐसे ही लोग वेश्या के मददगार हो सकते हैं।

श्लोक-10. गम्यचिन्तामाह-

     केवलार्थास्त्वमी गम्याः- स्वतंत्रः पूर्वे वयसि वर्तमानों वित्तवानपरोक्षवृत्तिरधिकरणवानकृच्छ्राधिगतवित्तः। संघर्षवान् सन्ततायः सुभगमानि श्लाघनकः पण्डकश्च पुंशब्दार्थी। समानस्पर्धी स्वभावतस्तागी। राजनि महामात्रे वा सिद्धो दैवप्रमाणो वित्तावमानी गुरुणां शासनातिगः सजाताम् लक्ष्यभूतः सवित्त एक पुत्रो लिंगी प्रच्छन्नकामः शूरो वैद्यश्चेति।।10।।

अर्थः अधिकतर वेश्याएं उन्हीं लोगों से लेन-देन करती हैं, जो सामाजिक पारिवारिक बन्धनों से मुक्त स्वतंत्र होते हैं। एक बंधी हुई आमदनी वाले वरुण होते हैं और जो व्यक्ति अधिक धन खर्च करते हैं, जिनके पास पैतृक संपत्ति हो जो स्वयं न कमाकर दूसरों की कमाई खर्च करते हो। इसी तरह जिस व्यक्ति को अपने रूप, यौवन तथा धन पर गर्व हो, जो नपुंसक होकर भी अपने को अधिक सेक्स क्षमता से युक्त मानता हो, जिसकी धन देने की स्वाभाविक प्रवृत्ति हो, राजा और मंत्री पर जिसका प्रभाव हो, ज्योतिषी, आवारा माता-पिता का जो इकलौता संतान हो। संयासी जो वेश्या से संबंध बनाकर छिपाना चाहता हो और शारीरिक रूप से शक्तिशाली व्यक्तियों से वेश्याएं धन प्राप्त करने के लिए संबंध बनाती हैं।

श्लोक-11. प्रीतियशोऽर्थास्तु गुणतोऽधिगम्याः।।11।।

अर्थः जो वेश्याएं विशुद्ध प्रेम तथा यश की ख्वाहिश रखती हैं, वे वेश्याएं गुणी कलाकार व्यक्तियों से ही संबंध बनाने को महत्व देती हैं।

श्लोक-12. महाकुलीनो विद्वान्सर्वसमयज्ञः कविराख्यानकुशलो वाग्मी प्रगल्भो विविधशिल्पज्ञो वृद्धदर्शी स्थूललक्षो महोत्साहो दृढभक्तिरनसूयकस्त्यागी मित्रवत्सलो घटागोष्ठीप्रेक्षकसमाजसमस्या क्रीडनशीलो नीरुजोऽव्यंगशरीरः प्राणवानमद्यपो वृषो मैत्रः स्त्रीणां प्रणेता लालयिता च। न चासां वशगः स्वतंत्रवृत्तिरनिष्ठुरोऽनीर्ष्यालुरनवशंकी चेति नायक- गुणाः।।12।।  

अर्थः वेश्याएं जिन गुणों के अनुसार लोगों की तरफ आकर्षित होती हैं वे गुण हैं- अधिक विद्वान होना, संकेतों को समझना, कवि, कहानीकार, बात करने में चतुर, हस्तशिल्प का विशेषज्ञ, विनम्र, ऊंचे विचारों वाला,  उत्साही सम्पन्नता, दृढ़ प्रतिज्ञ, दूसरों की निंदा न करने वाला, त्यागी, शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ, इकहरा बदन, नशीली वस्तुओं से नफरत करने वाला, प्रचंड वेग, दयावान, स्त्रियों के सदाचार के समर्थक तथा पालक स्त्रियों के वशीभूत न होना, स्वतंत्र वृत्ति, ईर्ष्यारहित तथा निर्भयता आदि।

श्लोक-13. नायिकायाः पुना रूपयौवनलक्षणमाधुर्ययोगिनी गुणेष्वनुरक्ता न तथार्थेषु प्रीतिसंयोगशीला स्थिरमतिरेकजातीया विशेषार्थिनी नित्यमकदर्यवृत्तिगोष्ठीकलाप्रिया चेति नायिकागुणाः।।13।।             अर्थः इस श्लोक के अंतर्गत सुंदर लड़कियों के बारे में जानकारी दी गयी है जो निम्न हैं- सुंदर चेहरा, प्रिय, रूप, यौवन, माधुर्यसंपन्नता, प्रेमी के गुणों पर मोहित होना न कि धन पर, सेक्स की इच्छा करने वाली, स्थिर बुद्धि, गुणों पर आकर्षित होने वाली, पतिव्रता और विभिन्न सम्मेलनों तथा कलाओं से प्यार करने वाली हो।

श्लोक-14. नायिका पुनर्बुद्धिशीलाचार आर्जवं कृतज्ञता दीर्घदूरदर्शित्वं अविसंवादिता देशकालज्ञता नागरकता दैन्यातिहासपैशुन्यपरिवादक्रोधलोभ स्तम्भ चापल वर्जनं पूर्वाभिभाषिता कामसूत्र कौशलं तदंगविद्यासु चेति साधारणगुणाः।।14।।

अर्थः इस श्लोक के अंतर्गत प्रेमी तथा प्रेमिका दोनों के सामान्य गुणों के बारे में जानकारी दी गयी है जो निम्न हैं- बुद्धिशीलता, आचरण, विनम्रता, कृतज्ञता, दूरदर्शिता, वाद-विवाद से दूर रहना, सही समय और सही जगह को पहचानना, शिष्टाचार गुणयुक्त तथा याचना, निष्प्रयोजन हास्य, चुगलखोरी, निन्दा, क्रोध, लालच, अभिमान तथा चंचलता आदि बुराइयों से दूर रहना और जब तक कोई कुछ न पूछे तब तक चुप रहना, कामशास्त्र के कौशलों और कामसूत्र की अंगभूत विद्याओं के बारे पूरी जानकारी होना। ये सभी गुण प्रेमी और प्रेमिकाओं के हैं।

श्लोक-15. गुणाविपर्यये दोषाः।।15।।

अर्थः उपर्युक्त गुणों से रहित होने पर वही प्रेमी और प्रेमिका के दोष हो जाते हैं।

श्लोक-16. क्षयी रोगी कृमिशकृद्वायसास्यः प्रियकलत्रः परुषवाक्कदर्यो निर्घृणो गुरुजनपरित्यक्तः स्तेनो दम्भशीलो मूलकर्मणि प्रसक्तो मानापमानयोरनपेक्षी द्वेष्यैरप्यर्थहार्यो निर्लज्ज इत्यगम्याः।।16।।

अर्थः टी.बी. के रोगी, कुष्ठ रोगी, पेट के कीड़े का रोगी जिसके मुख से बदबू आती हो, पत्नीवृत्त, कड़वे वचन बोलने वाला, दुराचारी, निर्दयी, माता-पिता के द्वारा घर से निकाले हुए, चोर, दम्भी (कपटी), जादूगर, मान-अपमान की परवाह न करने वाला, लालच में दुश्मनों से मिल जाने वाला तथा शर्म-संकोच न करने वाला आदि गुणों वाले लोगों से वेश्या को सेक्स संबंध नहीं बनाने चाहिए।

श्लोक-17. रागो भयमर्थः संघर्षों वैरनिर्यातनं जिज्ञासा पक्षः खेदो धर्मोयशोऽनुकंपा सुहृद्वाक्यं हीः प्रियसाद्दश्यं धन्यता रागापनयः साजात्यं साहवेश्यं सातत्यमायतिश्च गमनकारणानि भवन्तीत्याचार्याः।।17।।

अर्थः भय, प्रेम, अर्थ, लड़ाई-झगड़ा तथा बदले की भावना, पक्षपात, दुःख, धर्म, प्रसिद्ध, अनुकम्पा, शर्म-संकोच, प्रेमी के अनुरूप होना, धनी, निस्तेज रहित, सजातीयता, साथ रहना तथा प्रभाव- आदि सभी गुण समागम के कारण होते हैं।

श्लोक-18. अर्थोंऽनर्थप्रतीघातः प्रीतिश्चेति वात्स्यायनः।।18।।

अर्थः आचार्य वात्स्यायन के अनुसार- धर्म तथा अनर्थ की हानि व प्रेम ही समागम के कारण होते हैं।

श्लोक-19. अर्थस्तु प्रीत्या न बाधितः। अस्य प्राधान्यात्।।19।।

अर्थः जहां पर प्रेम तथा धन दोनों हों वहां प्रेम को छोड़कर धन के बारे में सोचना चाहिए।

श्लोक-20. भयादिषु तु गुरुलाघवं परीतक्ष्यमिति सहागम्यागम्य (गमन) कारणचिन्ता।।20।।

अर्थः डर आदि के जो गमन के कारण पहले सूत्र के अंतर्गत बताएं गये हैं, उसमें से गुरुता (महत्व) तथा लाघव (निरादर) परीक्षा कर लेनी चाहिए। सहाय, गम्य, अगम्य तथा गमन के कारणों पर विचार पर समाप्त हुआ।

श्लोक-21. उपमन्त्रितापि गम्येन सहसा न प्रतिजानित्। पुरुषाणां सुलभावमानित्वात्।।21।।

अर्थः सेक्स करने की इच्छा के वशीभूत होकर पुरुष यदि सेक्स करने के लिए बुलाए तो ऐसी स्थिति में वेश्या को तुरन्त ही सेक्स करने के लिए नहीं जाना चाहिए क्योंकि पुरुषों की आदत होती है कि जो वस्तु उन्हें आसानी से प्राप्त हो जाती है उसकी ओर उनका ध्यान नहीं जाता है और जो वस्तु दुर्लभ होती है, उसे वे प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

श्लोक-22. भावजिज्ञासार्थ परिचारकमुखान्समवाहकगायन वैहासिकान्गम्ये तद्रक्तान्वा प्रणिदध्यात्।।22।।

अर्थः वेश्या को यदि अपने प्रेमी के भावों की परीक्षा करनी हो तो वेश्या को अपने पैर दबाने के लिए नौकर, गाना सुनने के लिए गायक तथा विदूषक आदि प्रमुख सेवकों की नियुक्ति करनी चाहिए।

श्लोक-23. तदभावे पीठमर्दादीन्। तेभ्यो नायकस्य शोचाशौचं रागापरागौ सक्तासक्तातां दानादाने च विद्यात्।।23।।

अर्थः यदि उपर्युक्त विश्वस्त सेवक किसी कारणवश न मिल पायें तो उसके अभाव में वेश्या पीठमर्द (वेश्या का सहायक) की नियुक्ति करे, उसके द्वारा अपने प्रति प्रेमी की सोच, राग-विराग, शक्ति और कमजोरी, दान-कंजूसी आदि बातों की जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।

श्लोक-24. संभावितेन च सह विटपुरोगां योजयेत्।।24।।

अर्थः जिसमें अपनी चाहत की बातों की संभावना हो, उसके साथ विटं (विदूषक) को नियुक्त कर देना चाहिए।

श्लोक-25. लावककुक्कुटमेषयुद्धशुकशारिकाप्रलापनप्रेक्षणककलाव्यपदेशेन पीठमर्दो नायकं तस्यां उदवसितमानयेत्।।25।।

अर्थः वेश्या के द्वारा नियुक्त किये गये पीठमर्द (वेश्या का सहायक) को चाहिए कि वह लवा, मु्र्गा, मेढा की लड़ाई दिखाने के बहाने या तोता-मैना की बातें सुनने के लिए, कोई खेल-तमाशा आदि देखने के लिए और नृत्य-संगीत आदि देखने के बहाने वेश्या के प्रेमी को उसके घर लाये।

श्लोक-26. तां वा तस्य्।।26।।

अर्थः अथवा वेश्या को ही उसके प्रेमी के घर पर ले जाना चाहिए।

श्लोक-27. आगतस्य प्रीतिकौतुकजननं किंचिद्दव्यजातं स्वयमिदमसाधारणो-प्रभोग्यमिति प्रीतिदायं दद्यात्।।27।।

अर्थः यदि पुरुष वेश्या के घर आये तो उसे वेश्या को ऐसी वस्तुएं देनी चाहिए जो देखने में आश्चर्यजनक और उत्सुकता बढ़ाने वाली हों।

श्लोक-28. यत्र च रमते तया गोष्ठयैनमुपचारैश्च रञ्जयेत्।।28।।

अर्थः और जिस स्थान पर पुरुष का मन बहलता हो उसी स्थान पर वेश्या उचित साधनों, उपायों द्वारा उसका मनोरंजन करें।

श्लोक-29. गते च न सपरिहासप्रलापां सोपायनां परिचारिकामभीक्ष्णं प्रेषयेत्।।29।।

अर्थः वेश्या के घर से जब उसका प्रेमी चला जाए तो वह वेश्या मुस्कराकर बोलने वाली दासी के हाथ कुछ प्रेमोपहार देकर नायक के पास भेजे। इस प्रकार उपहार भेजते रहने का क्रम तब तक जारी रखना चाहिए जब तक कि प्रेमी उसके घर न आ जाए।

श्लोक-30. सपीठमर्दायाश्च कारणापदेशेन स्वयं गमनमिति गम्योपावर्तनम्।।3।।

अर्थः यदि आवश्यकता हो तो वेश्या को पीठमर्द (वेश्या का सहायक) के साथ स्वयं ही प्रेमी के घर पर जाना चाहिए। वेश्या के द्वारा प्रेमी को अपनी ओर झुकाने का प्रकरण यही समाप्त होता है।

श्लोक-31. भवन्ति चात्र श्लोकाः-

     ताम्बूलानि स्त्रजश्चैव संस्कृतं चानुलेपनम्। आगस्तस्याहरेत्प्रीत्या कलागोष्ठीश्च योजयोत्।।31।।

अर्थः इसके संबंध में प्राचीन श्लोक है- सुसंस्कृत पान, सुसंस्कृत माला, सुसंस्कृत चंदन, सुसंस्कृत परफ्यूम आदि आये हुए प्रेमी को प्रेमपूर्वक देना चाहिए तथा कला और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन करें।

श्लोक-32. द्रव्याणि प्रणये दद्यात्कुर्याच्च परिवर्तनम् संप्रयोगस्य चाकूतं निजेनैव प्रयोजयेत्।।32।।

अर्थः प्यार को बढ़ाने के लिए धन का आदान-प्रदान करें तथा सेक्स के गुप्त संकेतों को वेश्या स्वयं ही प्रकट करे।

श्लोक-33. प्रीतिदायैरुपन्यासैरुपचारैश्च केवलैः। गम्येन सह संसृप्टा रञ्जयेत्तं ततःपरम्।।33।।

अर्थः वेश्या को प्रेम-उपहार से पीठमर्द (वेश्या का सहायक) आदि की बातों को आराम से सुनकर तथा प्रेमसूचक भावों से प्रेमी को भाव-विभोर करके ही उसके साथ सेक्स करना चाहिए।

इससे पहले के प्रकरणों में पत्नी, पराई स्त्री तथा पुनर्भू- इन तीनों की तरह ही प्रेमिकाओं के साथ सेक्स करने के बारे में जानकारी दी गयी है। इसके अंतर्गत वेश्याओं के साथ सेक्स करने के उपाय विस्तार से दिये जा रहे हैं।

आचार्य वात्स्यान ने स्पष्ट किया है कि जब किसी पुरुष पर वेश्याएं प्रेम प्रकट करती हैं तो उनके उस प्रेम में धन का लालच छिपा हुआ होता है। वेश्याएं धन के लालच में आकर पुरुष को अपने हाव-भाव से इतना अधिक सम्मोहित कर लेती हैं कि वह समझ नहीं पाता है कि उसका उस पर जो प्रेम है वह कोरा और बनावटी है। जब किसी पुरुष को वेश्या अपने जाल में फंसाना चाहती है तो सबसे पहले वह अपने दलालों से सहायता मांगती है। वेश्या के ये सहायक दलाल वेश्या के गुणों की तारीफ करके पुरुषों को आकर्षित करने की कोशिश करते हैं।

वात्स्यायन के अनुसार वेश्या को ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए जो रोगी होते हैं क्योंकि रोगी का शरीर सेक्स करने लायक नहीं होता है। इसके अलावा वेश्या को उन लोगों से दूर रहना चाहिए जोकि पत्नीवृत होते हैं। इसका कारण यह है कि ऐसा व्यक्ति दूसरी स्त्रियों की तुलना मां-बहनों से करता है। यदि वेश्या उसे फंसाने की कोशिश करती है तो यह धर्म के विरुद्ध होता है। इसके साथ ही जो कटुभाषी, निर्दयी, अपने नौकरों को दुःखी करके धन एकत्र करता हो अथवा तांत्रिक हो। ऐसे लोगों से भी वेश्या को दूर रहना चाहिए क्योंकि ऐसे लोगों पर वेश्या का कोई भी चक्कर नहीं चल सकता है। ऐसे लोगों से वेश्या को धन की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए।

सेक्स की तीव्र इच्छा को ही मुख्य वासना माना गया है। वात्स्यायन के अनुसार अर्थ, अनर्थ की हानि तथा प्रेम यही तीन कारण होते हैं जिनके वशीभूत होकर पुरुष वेश्याओं के पास जाता है। कुछ आचार्यों के अनुसार वासनाएं अनेक हैं तथा वे मन की ऐसी रीतियां हैं जो जानवरों तथा व्यक्तियों में एक तरह से प्रकट होती हैं। जिसका प्रतिवेदन सभी प्राणी अनजाने में ही करते रहते हैं।

वात्यस्यान की दूसरी बात यह है कि वेश्याएं धन के लालच से पुरुषों को सेक्स के लिए आकर्षित करती हैं। वासनाएं अलग-अलग प्रकार की होती हैं और प्रत्येक वासना का अध्ययन भी अलग-अलग दृष्टिकोण से किया जाता है, क्योंकि सभी वासना में कुछ विशेष अंश पाये जाते हैं। वासना की मूल प्रवृत्ति की अवस्थाएं होती हैं- 1. वेग 2. उद्देश्य 3. विषय 4.  आश्रय स्थान। सभी वासनाओं का सार ही वेग कहलाता है। इस वेग की तीव्रता तथा कोमलता की पहचान सावधानी से करनी चाहिए।

इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे वैशिके षष्ठेऽधिकरणे सहायगम्यागम्यचिंता गमनकारणं गम्योपावर्तनं नाम प्रथमोऽध्याय।
प्रथम अध्याय : सहायगम्यागम्यगमन कारणचिन्ता प्रकरण प्रथम अध्याय : सहायगम्यागम्यगमन कारणचिन्ता प्रकरण Reviewed by Admin on 9:35 AM Rating: 5

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