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द्वितीय अध्याय : कान्तानुवुत प्रकरण

श्लोक-1. संयुक्ता नायकेन तद्रञ्जनार्थमेकचारिणीवृत्तमनुतिष्ठेत्।।1।।


अर्थः वेश्या जब भी किसी पुरुष के साथ सेक्स संबंध बनाये तो वेश्या को उसी पुरुष की पत्नी बनकर रहना चाहिए।

श्लोक-2. रञ्जयेन्न तु सञ्जेज सक्तवच्च विचेष्टेतेति संक्षेपोक्तिः।।12।।

अर्थः वेश्या का संक्षिप्त चरित्र यह है कि उसे अपने प्रेमी पर मोहित न होकर उसे आसक्त के समान व्यवहार करना चाहिए।

श्लोक-3. मातरि च क्रूरशीलायामर्थपरायां चायत्ता स्यात्।।3।।

अर्थः अधिक लोभी तथा क्रूर आचरण वाली मां के अधीन वेश्या को रहना चाहिए।

श्लोक-4. तदभावे मातृकायाम्।।4।।

अर्थः यदि वेश्या की सगी मां न हो तो जिसे उसने अपनी मां मान रखा है उसके अधीन ही उसे रहना चाहिए।

श्लोक-5. सा तु गम्येन नातिप्रीयेत।।5।।

अर्थः चाहे वेश्या की सगी मां हो अथवा मानी गयी मां हो- दोनों वेश्यापुत्री पर मोहित व्यक्ति के साथ अधिक प्रेम प्रदर्शित नहीं करती हैं क्योंकि अधिक प्रेम प्रदर्शित से नुकसान भी हो सकता है।

श्लोक-6. प्रसह्य च दुहितरमानयेत्।।6।।

अर्थः मां को चाहिए कि मिलने वाले के साथ अपनी पुत्री को अधिक देर तक न बैठने दें।

श्लोक-7. तत्र तु नायिकायाः संततमरतिर्निर्वेदो व्रीडा भयं च।।7।।

अर्थः यदि वेश्या की मां उपरोक्त व्यवहार करे तो वेश्या को अपने प्रेमी के सामने जाने में अरुचि, डर तथा शर्म प्रदर्शित करना चाहिए।

श्लोक-8. न त्वेव शासनातिवृत्तिः।।8।।

अर्थः वेश्यापुत्री को अरुचि, डर तथा संकोच को प्रदर्शित करते हुए भी मां के आदेश का पालन करना चाहिए।

श्लोक-9. व्यार्धि चैकमनिमित्तमजुगुप्सितमतचक्षुर्ग्रामनित्यं च ख्यापयेत्।।9।।

अर्थः वेश्यापुत्री को जब प्रेमी के पास से उठकर जाना हो तो उसे चाहिए कि वह कोई ऐसी बीमारी का बहाना बनाये जोकि निन्दित न हो तथा अचानक हो जाने वाली और अधिक दिनों तक लगातार न रहने वाली हो।

श्लोक-10. सति कारणे तदपदेशं च नायकानभिगनम्।।10।।

अर्थः जिस समय प्रेमी आया हो तथा उसके मिलने का कारण भी मौजूद हो फिर भी यदि वेश्या उससे न मिलना चाहे तो उसे कोई न कोई बहाना कर देना चाहिए।

श्लोक-11. सति कारणे तदपदेशं च नायकानभिगनम्।।10।।

अर्थः वेश्यापुत्री को अपने प्रेमी से न मिलने का दूसरा बहाना यह है कि प्रेमी के आ जाने पर वेश्या को उसके पास स्वयं न जाकर नौकरानी से पान, इलायची आदि भेज देना चाहिए।

श्लोक-12. व्यवाये तदुपचारेषु विस्मयः।।12।।

अर्थः सेक्स के समय में प्रेमी जो भी चीज वेश्या को खाने के लिए दे। तो वेश्या को उसे लेकर खा लेना चाहिए, फिर कहना चाहिए कि इससे अच्छी चीज उसने कभी भी नहीं खायी थी।

श्लोक-13. चतुःषष्टयां शिष्यत्वम्।।13।।

अर्थः वेश्या को सेक्स करने के समय सेक्स कलाओं से अंजान बनकर रहना चाहिए। इसके साथ ही उसे प्रेमी से कहना चाहिए कि मुझे सेक्स के बारे में कुछ भी नहीं मालूम है जैसा आप कहेंगे, मैं वैसा ही करुंगी।

श्लोक-14. चतुःषष्टयां शिष्यत्वम्।।14।।

अर्थः वेश्या को सेक्स के दौरान प्रेमी के द्वारा बताये गये आसनों का ही प्रयोग करना चाहिए।

श्लोक-15. तत्सात्म्यद्रहसि वृत्तिः।।15।।

अर्थः अकेले में प्रेमी के अनुकूल ही व्यवहार करना चाहिए।

श्लोक-16. मनोरथानामाख्यानम्।।16।।

अर्थः वेश्या को अकेले में अपने प्रेमी से यह भी कह देना चाहिए कि मेरी तो इच्छा है कि आप रात भर मेरे साथ सेक्स करते रहें।

श्लोक-17. गुह्यानां वैकृतवृच्छादनम्।।17।।

अर्थः वेश्या के प्रजनन अंगों में यदि किसी भी प्रकार का विकार हो तो उसे छिपाकर रखना चाहिए।

श्लोक-18. शयने परावृत्तस्यानुपेक्षणम्।।18।।

अर्थः वेश्या से मिलने आया हुआ प्रेमी जिस करवट की ओर सो रहा हो, उसके मुंह की तरफ अपना मुंह करके वेश्या को लेटना चाहिए। जिससे आसक्ति प्रकट हो सके।

श्लोक-19. आनुलोम्यं गुह्यस्पर्शने।।19।।

अर्थः यदि प्रेमी सेक्स के समय गुप्तांगों को स्पर्श करे तो वेश्या को उसका विरोध नहीं करना चाहिए। बल्कि उसे उत्साहित करना चाहिए।

श्लोक-20. सुप्तस्य चुम्बनमालिंगनं च ।।20।।

अर्थः वेश्या को चाहिए कि वह सोये हुए प्रेमी का चुंबन और आलिंगन करे।

श्लोक-21. प्रेक्षणमन्यमनस्कस्य। राजमार्गे च प्रासादस्थायास्तत्र विदिताया व्रीडा शाठयनाशः।।21।।

अर्थः वेश्या को चाहिए कि वह अपने प्रेमी को जाते हुए देखे। जब वह अधिक दूर तक चला जाए तो उसे छत पर जाकर देखे। यदि प्रेमी की नजर उस पर पड़ जाए तो उसे शर्म से नजरें झुका लेनी चाहिए। यदि वह शर्माती है तो इससे बनावटी प्रेम प्रकट होगा।

श्लोक-22. तद्द्वेष्ये द्वेष्यता। तत्प्रिये। तद्रम्ये रतिः। तमनु हर्षशोकौ। स्त्रीषु जिज्ञासा। कोपश्चादीर्घः।।22।।

अर्थः अपने प्रेमी के दुश्मनों से दुश्मनी रखें। उसके प्रेमी से प्रेम से करें, जब उसकी सेक्स की इच्छा हो तो सेक्स करें। जब वह प्रसन्न हो तो प्रसन्न हो जाएं और जब वह दुखी हो तो उसे भी दुःखी हो जाना चाहिए। स्त्रियों के बारे में जानने की कोशिश करें तथा गुस्सा करे तो थोड़ी देर तक हो।

श्लोक-23. स्वकृतेष्वपि नखदर्शनचिन्हेष्वन्याशंका।।23।।

अर्थः प्रेमी के अंगों पर स्वयं अपने दांतों तथा नाखूनों से काटकर निशान बना दें और दूसरे दिन किसी और के निशान होने की शंका करें।

श्लोक-24. अनुरागस्यावचनम्।।24।।

अर्थः वेश्या को अपने मुंह से अनुराग प्रकट नहीं करना चाहिए।

श्लोक-25. आकारतस्तु दर्शयेत्।।25।।

अर्थः भाव-भंगिमाओं से अनुराग व्यक्त करें।

श्लोक-26. मदस्वप्नव्याधिषु तु निर्वाचनम्।।26।।

अर्थः प्रेमी के आने पर उसे सोने का अथवा बेहोशी का बहाना करके यह प्रकट करने की कोशिश करनी चाहिए कि तुम्हारे न मिलने से हमारी यह स्थिति हुई है।

श्लोक-27. श्लाघ्यानां नायककर्मणां च।।27।।

अर्थः इसी प्रकार के बहानों से प्रेमी के अच्छे कार्यों को भी कहे।

श्लोक-28. तस्मिन्ब्रुवाणे वाक्यार्थग्रहणम्। तदवधार्य प्रशंसाविषये भाषणम्। तद्ववधार्य प्रसंसाविषये भाषणम्। तद्वाक्यस्य चोत्तरेण योजनम्। भक्तिमांश्चेत्।।28।।

अर्थः वेश्या को अपने प्रेमी की बातों का अर्थ समझना चाहिए तथा उसका निश्चय करके उसकी प्रसंसा करें। प्रसंगात विषयों पर बहस करें। उसकी बात का जवाब उस स्थिति में दें कि जब कि जान जाये कि यह स्नेहशील है।

श्लोक-29. कथास्वनुवृत्तिरन्यत्र सपत्न्याः।।29।।

अर्थः केवल सौतनों की ही बात छोड़कर प्रेमी की हर बात पर हां पर हां करनी चाहिए।

श्लोक-30. निःश्वासे जृम्भिते स्खलिते पतिते वा तस्य चार्तिमाशंसीत्।।30।।

अर्थः प्रेमी के उसांसे भरने पर, पैसा-रुपया भूल जाने पर या कहीं पर भी गिरने पर दुःख प्रकट करना चाहिए।

श्लोक-31. क्षुतव्याह्वतविस्मितेषु जीवेत्युदाहरणम्।।31।।

अर्थः प्रेमी के छींकने पर, कोई आश्चर्यजनक बात कहने पर तथा आश्चर्य प्रकट करने पर जीते रहो कहना चाहिए।

श्लोक-32. दौर्मस्ये व्याधिदौर्हृदापदेशः।।32।।

अर्थः प्रेमी के मन को दुःखी देखकर उसके दुःख का कारण पूछना चाहिए। जब प्रेमी कुछ बताये तो उससे तुरंत ही कहे कि यह बीमारी तो मुझे बहुत दिनों से है।

श्लोक-33. गुणतः परस्याकीर्तनम्।।33।।

अर्थः प्रेमी के सामने किसी भी दूसरे व्यक्तियों के गुणों की तारीफ न करें।

श्लोक-34. न निंदा समानदोषस्य।।34।।

अर्थः और जिसमें प्रेमी के समान दोष हो उसकी निंदा भी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक-35. दतस्य धारणम्।।35।।

अर्थः यदि प्रेमी ने वेश्या को कोई चीज उपहार में दी है तो उसके द्वारा उपहार दी गयी चीज का उपयोग वेश्या को उसके सामने ही करना चाहिए।

श्लोक-36. वृथापराधे तद्यसने वालंकारस्याग्रहणमभोजनं च।।36।।

अर्थः प्रेमी के द्वारा झूठा इल्जाम लगाने पर या प्रेमी पर किसी भी प्रकार की कोई मुसीबत आ जाने पर उसे भोजन तथा श्रृंगार का त्याग कर देना चाहिए।

श्लोक-37. तद्युक्ताश्च विलापाः।।37।।

अर्थः उसे जोर-जोर से विलाप करके रोना चाहिए।

श्लोक-38. तेन सह देशमोक्षं रोचयेद्राजनि निष्क्रियं च।।38।।

अर्थः प्रेमी से कहना चाहिए कि मुझे अपने साथ लेकर दूसरे देश चलो, राज्य शासन को जुर्माना देकर मुझे रख लो अथवा चुपचाप भगा ले चलो।

श्लोक-39. सामर्थ्यमायुषस्तदवाप्तौ।।39।।

अर्थः उसे प्रेमी से यह कहना चाहिए कि तुम्हारे मिलने से ही मेरा जीवन सफल हो गया।

श्लोक-40. तस्यार्थागमेऽभिप्रेतसिद्धौ शरीरोपचये वा पूर्वसंभाषित इष्टदेवतोपहारः।।40।।

अर्थः प्रेमी को धन की प्राप्ति होने पर, इच्छित वस्तु की प्राप्ति होने पर और शारीरिक रोग के नष्ट हो जाने पर देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करनी चाहिए।

श्लोक-41. नित्यमलंकारयोगः। परिमितोऽभ्यवहारः।।41।।

अर्थः वेश्या को हमेशा साज-श्रृंगार किये रहना चाहिए तथा संतुलित भोजन करना चाहिए।

श्लोक-42. गीते च नामगोत्रयोर्ग्रहणम्। ग्लान्यामुरसि ललाटे च करं कुर्वीत्। तत्सुखमुपलम्य निद्रालाभः।।42।।

अर्थः एकचारिणी वेश्या जब भी गाना गाये तो गाने में प्रेमी का नाम तथा गोत्र रखना चाहिए। यदि तबियत खराब हो तो प्रेमी के हाथों को अपने माथे तथा दिल पर रख ले। उसके हाथ के स्पर्श के बहाने सो जाया करे।

श्लोक-43. उत्संगे चास्योपवेशनं स्वपनं च। गमनं वियोगे।।43।।

अर्थः वेश्या को प्रेमी की गोद पर बैठ जाना चाहिए और कभी-कभी सो भी जाना चाहिए, यदि कहीं एक साथ जा रहे हो तो उसे प्रेमी के पीछे-पीछे चलना चाहिए।

श्लोक-44. तस्मात्पुत्रार्थिनी स्यात्। आयुषो नाधिक्यमिच्छेत्।।44।।

अर्थः उसे अपने प्रेमी से पुत्र लाभ की इच्छा करे तथा उससे पहले मर जाने की इच्छा करें।

श्लोक-45. एतस्याविज्ञातमर्थ रहसि न ब्रूयात्।।45।।

अर्थः प्रेमी को जिस धन के बारे में जानकारी हो उसका रहस्य अकेले में नहीं बताना चाहिए।

श्लोक-46. व्रतमुपवासं चास्य निर्वतेयेत् मयि दोष इति। अशक्ये स्वयमपि तद्रूपा स्यात्।।46।।

अर्थः इसका दोषी मुझे माना जाएगा यह कहकर उसे उपवास करने की सलाह दें। यदि वह न माने तो उसके साथ स्वयं भी उपवास करें।

श्लोक-47. विवादे तेनाप्यशक्यमित्यर्थनिर्देशः।।47।।

अर्थः किसी दूसरे के साथ झगड़ा होने पर उसे यह कहना चाहिए कि इसे तो उसका प्रेमी ही पूरा कर सकता है।

श्लोक-48. तदीयमात्यमीयं वा स्वयमविशेषेण पश्येत्।।48।।

अर्थः अपने प्रेमी की धन संपत्ति को अपने धन के समान ही समझना चाहिए।

श्लोक-49. तेन विना गोष्ठयादीनामगमनमिति।।49।।

अर्थः किसी भी गोष्ठी (कार्यक्रम, सम्मेलन) में जाना हो तो प्रेमी के साथ ही जाएं।

श्लोक-50. निर्माल्यधारणे श्लाघा उच्छिष्टभोजने च।।50।।

अर्थः उसे प्रेमी की उतारी गयी वस्तुओं को पहनने तथा उसका झूठा खाना खाने में अपना गौरव महसूस करना चाहिए।

श्लोक-51. कुलशीलशिल्पजातिविद्यावर्णवित्तदेशमित्रगुणवयोमाधुर्य़पूजा।।51।।

अर्थः अपने प्रेमी के वंश, शील, शिल्प, जाति, विद्या, रंग, रूप, धन, निवास स्थान, मित्र, गुरू, अवस्था तथा मधुरता की प्रशंसा करनी चाहिए।

श्लोक-52. गीतादिषु चोदनमभिज्ञस्य।।52।।

अर्थः यदि प्रेमी को गाना गाना आता हो तो उसे गाना सुनाने के लिए कहना चाहिए।

श्लोक-53. भयशीतोष्णवर्षाण्यनपेक्ष्य तदभिगमनम्।।53।।

अर्थः प्रेमी के यहां अभिसार (मिलन) के लिए जाना हो तो गर्मी, जाड़ा तथा वर्षा की परवाह नहीं करनी चाहिए।

श्लोक-54. स एवं च मे स्यादित्यौर्ध्नदेहिकेषु वचनम्।।54।।

अर्थः उसे प्रेमी से यह कहना चाहिए कि अगले जन्म में भी मुझे तुम पति के रूप में मिलो।

श्लोक-55. तद्विष्टरसभावशीलानुवर्तनम्।।55।।

अर्थः प्रेमी को जो रस, भाव तथा शील रुचिकारी हो, उसी का उसे अनुसरण करना चाहिए।

श्लोक-56. मूलकर्माभिशंका।।56।।

अर्थः प्रेमी के ऊपर जादू-टोने का शक करें।

श्लोक-57. तदभिगमने च जनन्या सह नित्यो विवादः।।57।।

अर्थः प्रेमी से मिलने के लिए मां से रोजाना झगड़ा करना चाहिए।

श्लोक-58. बलात्कारेण च यद्यन्यत्र तथा नीयेत तदा विषमनशमनं शस्त्रं रज्जुमिति कामयेत्।।58।।

अर्थः यदि मां जबर्दस्ती किसी से सेक्स करने के लिए कहे तो उसे कहना चाहिए कि मैं जहर खा लूंगी, फांसी लगा लूंगी या चाकू मार लूंगी।

श्लोक-59. प्रत्यायनं च प्रणिधिभिर्नायकस्य। स्वयं वात्मनो वृत्तिग्रहणम्।।59।।

अर्थः एकचारिणी वेश्या के बारे में यदि प्रेमी को पता चल जाए कि वह दूसरे लोगों से भी संबंध बनाती है तो वेश्या को उसे यह बता देना चाहिए कि यह कार्य वह अपनी मां के कारण करती है। यदि उनके समझाने पर उसे यकीन न हो तो स्वयं उसके सामने वेश्यावृत्ति की निंदा करनी चाहिए।

श्लोक-60. न त्वेवार्थेषु विवादः।।60।।

अर्थः विशेष प्रेमी को छोड़कर अन्य दूसरे से सहवास कराने में मां से भले ही विवाद हो, लेकिन उससे धन के बारे में कभी-भी बहस न करें। मां उसे जिस किसी के पास भी सेक्स करने के लिए भेजे। उसे वहां जा करके उस व्यक्ति को खुश करके अधिक से अधिक धन प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

श्लोक-61. मात्रा विना किंचित्र चेष्टेत।।61।।

अर्थः वेश्या को अपनी मां से आज्ञा लिए बगैर कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए।

श्लोक-62. प्रवासे शीघ्रागमनाय शापदानम्।।62।।

अर्थः एकचारिणी वेश्या का प्रेमी यदि किसी कारणवश दूसरे प्रदेश जाने लगे तो वेश्या को उससे कहना चाहिए कि- तुम्हे मेरी सौगंध, तुम शीघ्र ही घर लौटकर आना।

श्लोक-63. प्रोषिते मृजानियमश्चालंकारस्य प्रतिषेधः। मंगलं त्वपेक्ष्यम्। धारयेत्।।63।।

अर्थः प्रेमी के परदेश जाने के बाद प्रेमिका को साबुन, तेल आदि चीजों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। अन्य आभूषणों को धारण नहीं करना चाहिए। केवल मांगलिक निशान शंख की चूड़ियां न उतारे।

श्लोक-64. स्मरणमतीतानाम्। गमनमीक्षणिकोपश्रुतीनाम्। नक्षत्रचंद्रसूर्यताराभ्यः स्पृहणम्।।64

अर्थः प्रेमी को गुजरी बातों को याद करके शीघ्र ही वापस लौट आने के लिए सगुन घर वाली स्त्रियों के पास जाना चाहिए। रात का सगुन देखे तथा रात को चांद-तारों की रोशनी से ईर्ष्या प्रकट करें।

श्लोक-65. इष्ट स्वप्रदर्शने तत्संगो ममास्त्विति वच।।65।।

अर्थः खूबसूरत सपनों को देखकर प्रेमी से समागम हो- इस प्रकार की बातें करें।

श्लोक-66. उद्वेगोऽनिष्टे शान्तिकर्म च।।66।।

अर्थः बुरे सपनों को देखने पर अनिष्ट की शांति कराएं।

श्लोक-67. प्रत्यागते कामपूजा।।67।।

अर्थः प्रेमी के सकुशल लौट आने पर प्रेमिका को कामदेव की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक-68. देवतोपहाराणां करणम्।।68।।

अर्थः प्रेमी के सकुशल लौटने के बाद प्रेमिका ने जिन-जिन देवताओं से मान्यता मांगी हो उन्हें जाकर भेंट आदि चढा़ना चाहिए।

श्लोक-69. सखीभिः पूर्णपात्रस्याहरणम्।।69।।

अर्थः इष्टकामना रखकर स्वजनों से पूर्णपात्र (उत्तरीय) सखियों के साथ झपटकर ले ले।

श्लोक-70. वायसपूजा च।।70।।

अर्थः काक बलि प्रदान करे।

श्लोक-71. प्रथमसमागमानन्तरं चैतदेव वायसपूजावर्जम्।।71।।

अर्थः कौवे की बलि को छोड़कर बाकी सभी काम जैसे पूजा, देवताओं को भेंट चढ़ाना आदि कार्यों को प्रवास से लौटे हुए प्रेमी से संभोग करने के बाद ही करें।

श्लोक-72. सक्तस्य चानुमरणं ब्रूयात्।।72।।

अर्थः प्रेमी के साथ सती हो जाने की बात कहा करे।

श्लोक-73. निसृष्टभावः समानवृत्तिः प्रयोजनकारी निराशंकों निरपेक्षोऽर्थेष्विति सक्तलक्षणानि।।73।।

अर्थः आसक्त प्रेमी वही होता है जो प्रेमिका पर पूरा विश्वास रखे। उसके समान अपना आचरण बना लें। प्रेमिका के कहने के साथ ही उसके कार्य कर दें, उसके प्रति संदेहशील न हो तथा धन की परवाह नहीं करनी चाहिए।

श्लोक-74. तदेतन्निदर्शनार्थ दत्तकशासनादुक्तम्। अनुक्तं च लोकलः शीलयेत्पुरुषप्रकृतितश्च।।74।।

अर्थः आचार्य दत्तक के द्वारा लिखे गये शास्त्र को देखकर संक्षेप में यह वेश्यावृत्त लिखा गया है जो बात यहां नहीं कही गयी है, उसे पराई औरतों, वेश्याओं की आराधना करने में कुशल लोगों के आचरणों को देखकर ही समझ लेना चाहिए।

श्लोक-75. भवतश्चात्र श्लोकों-

     सूक्ष्मत्वादतिलोभाच्च प्रकृत्याज्ञानतस्तथा। कामलतक्ष्म तु दुर्ज्ञानं स्त्रीणां तद्रावितैरपि।।75।।

अर्थः इस विषय के दो श्लोक हैं- वेश्याओं को समझ पाना बहुत ही कठिन होता है। इसलिए कि मन में क्या चल रहा है, इसे हम अपनी इन्द्रियों से नहीं देख सकते हैं। क्योंकि वेश्याओं में धन की लालच अधिक होती है। इसके अलावा उसके पास आने वाले व्यक्ति भी कम बुद्धि वाले होते हैं।

श्लोक-76. कामयंते विरज्यन्ते त्यजन्ति च। कर्षयन्त्योऽपि सर्वार्थाञ्ज्ञायन्ते नैव योषितः।।76।।

अर्थः अपने प्रेमी को वेश्याएं प्रेम करती हैं। उन्हें अधिक प्रेम करती है तथा त्याग भी देती हैं। वे अपने प्रेमियों से धन ऐंठ लेती हैं और उन्हें महसूस भी नहीं होता है।

वेश्या अपने प्रेमी से किस प्रकार का व्यवहार करें। उस प्रेम के बंधन को किस प्रकार मजबूत बनाये। इसके बारे में प्रथम प्रकरण में उल्लेख किया गया है। इसके अंतर्गत यह बताया गया है कि प्रेमिका को अपने प्रेमी के साथ किस प्रकार का आचरण करना चाहिए। आचार्य वात्यास्यन वेश्या को उसका खोया हुआ गौरव वापस दिलाने के लिए सबसे पहले उसे एकचारिणी स्त्री बनने की सलाह देते हैं। यानी जो वेश्या नाचने-गाने के कार्य करती है उसे किसी एक आदमी की बनकर रहना चाहिए।

यदि वेश्या अपना धंधा छोड़ देती है तो उसके प्रेमी का विश्वास उस पर हो जाता है। इसके अलावा आचार्य वात्स्यायन वेश्या को सावधान करते हुए कहते हैं कि जिस तरह पत्नी एकचारिणी होकर अपने पति को अपना सब कुछ न्यौछावर कर देती है। वैसा आचरण वेश्या के लिए उचित नहीं होता है क्योंकि वेश्या एक पेशेवर औरत होती है तथा दूसरों को अपनी तरफ आकर्षित करके उनसे पैसा कमाना ही उसके प्रेम का लक्ष्य होता है। इसलिए वेश्या को सिर्फ प्रेम का प्रदर्शन करना चाहिए। उसे केवल अपना तन सौंपना चाहिए मन नहीं। अन्यथा उसका धंधा धीरे-धीरे करके नष्ट हो जायेगा।इति श्रीवात्स्यायनाये कामसूत्रे वैशिके पष्ठेऽधिकरणे कान्तानुवृत्तं द्वितीयोऽध्यायः।।
द्वितीय अध्याय : कान्तानुवुत प्रकरण द्वितीय अध्याय : कान्तानुवुत प्रकरण Reviewed by Admin on 9:41 AM Rating: 5

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