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द्वितीय अध्याय : आलिंगन विचार प्रकरण

श्लोक-1. संप्रयोगाअंग चतुः षष्टिरित्याचक्षते। चतुःषष्टिप्रकरणत्वात्।।
अर्थ- कामसूत्र के विद्वानों ने संभोग कला के 64 अंगों के बारे में बताया है।

श्लोक-2. शास्त्रमेवेदं चतुःषष्टिरित्याचार्यवादः।।अर्थ- बहुत से आचार्य कहते हैं कि पूरे काम-शास्त्र के ही 64 अंग हैं।

श्लोक-3. कलानां चतुःषष्टित्वात्तासां च संप्रयोगाअंगभूतत्वात्कलासमूहो वा चतुःषष्टरिति। ऋचां दशतयीनां च संज्ञितत्वात्। इहापि तदर्थसम्बन्धात्। पञ्ञालसंबन्धाच्च बह्रचैरेषा पूजार्थ संज्ञा प्रवर्तिता इत्येके।।
अर्थ- यह 64 कलाओं की संख्या है क्योंकि कलाएं संभोग का अंग मानी जाती हैं। कलाओं की संख्या होने से कामशास्त्र को भी 64 कलाओं वाला माना जाने लगा है। जिस प्रकार से ऋग्वेद में दशमंडल होने से उसे दशतयी कहा जाता है।

श्लोक-(4)-आलिंगनचुम्बननखच्छेद्यदशनच्छेद्यसंवेशनसीत्कृतपुरुषायितौपरिष्यकानामष्टानामष्टाधा विकल्पभेदादष्टावष्टाकाश्चतुः षष्टिरिति बाभ्रवीयाः।।
अर्थ- बाभ्रवीय आचार्यों के मुताबिक आलिंगन, चुंबन, नखक्षत (नाखूनों से काटना), दंतक्षतों (दांतों से काटना), संवेशन (साथ-साथ सोना), सीत्कृत, पुरुषायित (विपरीत आसन) तथा मुखमैथुन 8 प्रकार की संभोग क्रिया होती है और इनके भी 8-8 भेद होने से 64 प्रकार की संभोग कलाएं होती हैं।

श्लोक-5. विकल्पवर्गाणामष्टानां न्यूनाधिकत्वदर्शनात् प्रहणनदिरुतपुरुषोपयृपतचित्ररतादीनामन्येषामपि वर्गाणामिह प्रवेशनात्प्रायोवादोऽयम्। यथा सप्तपर्णो वृक्ष। पञ्ञवर्णों बलिरिति वात्स्यायनः।।
अर्थ- वात्स्यायनः के मुताबिक बाभ्रवीय आचार्यों का संभोग कला के 64 भेदों के बारे में दिया गया मत गलत है क्योंकि इनमें से सबसे 8-8 भेद नहीं होते बल्कि किसी के कम होते हैं तो किसी के ज्यादा होते हैं। इसके अलावा इन आठों से अलग प्रहणन, विरुत पुरुषोपसृत, चित्ररत आदि नाम के और भी संभोग बाभ्रवीयों के साम्प्रयोगिक अधिकरण में सन्निविष्ट हैं। इसलिए साम्प्रयोगिक अधिकरण में 64 अंगों को मानना सही नहीं है।
इसके अलावा वात्स्यायन मुनि कुंवारे और मनचले लोगों के लिए और विवाहित लोगों के लिए आलिंगन भेद बताते हैं।

श्लोक-6. तत्रासमागतयोः प्रीतिलिंगद्योतनार्थमालिंगन चतुष्टयम्। स्पृष्टकम्, विद्धकम, उदधृष्टकम, प्रीडितकम्, इति।।
अर्थ- जो स्त्री और पुरुष मनचले और कुंवारे होते हैं उन्हें आपस में अपने प्यार को प्रकट करने के लिए चार प्रकार के आलिंगन करने चाहिए- स्पृष्टक, बिद्वक, उदृघृष्टक और पीडितक।

श्लोक-7. सर्वत्र संज्ञार्थेनैव कर्मातिदेशः।।
अर्थ- स्पृष्टक, विद्वक आदि पारिभाषिक अल्फाज अपने नाम से ही अपने कर्माप्तिदेश को सूचित करते हैं।
इसके अंतर्गत हर आलिंगन का लक्षण बताते हैं-

श्लोक-8. संमुखागतायां प्रयोज्यायामन्यापदेशेने गच्छेतो गात्रेण गात्रस्य स्पर्शन स्पृष्टकम्।।
अर्थ- स्पृष्टक :
अपने सामने से आती हुई स्त्री के जिस्म को किसी बहाने से छूना स्पृष्टक आलिंगन कहलाता है।
श्लोक-9. प्रयोज्यं स्थितमुपविष्टं वा विजने किंचिद् गृह्णती पयोधरेण विद्धयेत्। नायकोऽपि तामवपीडय्च गुह्णीयादिति विद्धकम्।।
अर्थ- विद्वक :
जब स्त्री पुरुष को किसी एकांत स्थान में बैठे हुए या खड़े हुए देखती है तो किसी वस्तु को उठाने के बहाने अपने स्तनों को उसके शरीर से छुआ दे तथा पुरुष भी उसके स्तनों को कसकर दबाए। इसको विद्वक आलिंगन कहा जाता है।

श्लोक-10. तदुभयमनतिप्रत्तसंभाषणयोः।।
अर्थ- इन दोनों प्रकार के आलिंगनों का प्रयोग तभी करना चाहिए जब स्त्री और पुरुष आपस में ज्यादा वार्तालाप न कर रहे हो।

श्लोकृ-11. तमसि जनसंबाधे विजने वाथ शनकैर्गच्छतोर्नातिहस्वकालमुद्धर्पणं परस्परस्य गात्राणामुदघृष्यकम्।।
अर्थ- उदघृष्टक :
अगर भीड़-भाड़ में, अंधेरे में या एकांत में दोनों के ही शरीर एक-दूसरे से रगड़ खाते हैं तो उसे उदघृष्टक आलिंगन कहते हैं।

श्लोक-12. तदेव कुडचसंदंशन स्तम्भसंदंशेन वा स्फुटकमवपीडयेदिति पीडितकम्।।
अर्थ- किसी खंभे या दीवार के सहारे खड़े होकर जब स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के शरीर के कामुक अंगों को जोर-जोर से दबाते हैं तो उसे पीड़ितक आलिंगन कहा जाता है।

श्लोक-13. तदुभयमवगतपरस्पराकारयोः।।
अर्थ- उदघृष्टक और पीड़ितक आलिंगन ऐसे स्त्री और पुरुषों के लिए होते हैं जो आपस में तो बहुत प्यार करते हैं लेकिन उनके बीच में किसी तरह का शारीरिक संबंध न बना हो।
इसमें शादीशुदा स्त्री और पुरुषों के आलिंगनों के बारे में बताया गया है-

श्लोक-14. लतावेष्टिकं वृक्षाधिरूढकं तिलतण्डुलकं क्षीरनीरकमिति चत्वारि संप्रयोगकालें।।
अर्थ- संभोग क्रिया के समय लतावेष्ठितक, वृक्षाधिरूढक, तिलत्रण्डुक और क्षीरनीरक आलिंगनों को सबसे ज्यादा अच्छा माना गया है।
इसके अंतर्गत हर व्यक्ति के लक्षण अलग-अलग बताए जा रहे हैं-

श्लोक-15. लतेव शालमावेष्टयन्ती चुम्बनार्थ मुखमवनमयेत्। उद्धत्य मन्दसीत्कृता तमाश्रिता वा किंचिद्रामणीयकं पश्येत्तल्लातावेष्टितकम्।।
अर्थ- इसमें हर एक के लक्षणों को बताया जा रहा है-
लतावेष्टिक : जिस तरह से एक पेड़ के ऊपर एक लता लिपट जाती है वैसे ही स्त्री पुरुष से लिपटकर मुंह को हल्का सा झुकाकर थोड़ा हटकर सिसकारियां लेती हुई उसके मुख-सौंदर्य का अवलोकन करें तो इसको लतावेष्टिक आलिंगन कहते हैं।

श्लोक-16. चरणेन चरणामाक्रम्य द्वितीयेनोरुदेशामाक्रमन्ती वेष्टयन्ती वा तत्पृष्ठसक्तैकबाहुद्वितीयेनांसमवनमयन्ती ईषन्मन्द सीत्कृतकूजिता चुम्बनार्थमेवाधिरोढुमिच्छेदिति वृक्षाधिरूढकम्।।
अर्थ- वृक्षाधिरूढकम : जिस तरह से पेड़ पर चढ़ते हैं उसी तरह वृक्षाधिरूढकम आलिंगन में स्त्री अपने एक पैर से पुरुष के पैर को दबाती हैं और अपने दूसरे पैर से पुरुष के दूसरे पैर को पूरी तरह से लपेट लेती हैं। इसके साथ ही अपने एक हाथ को पुरुष की पीठ पर रखकर दूसरे हाथ से उसके कंधे तथा गर्दन को नीचे की तरफ झुकाती हैं और फिर धीरे-धीरे से पुरुष को चूमने लगती हैं और उस पर चढ़ने की कोशिश करती हैं। इस आलिंगन को वृक्षाधिरूढकम आलिंगन कहा जाता है।

श्लोक-17. तदभयं स्थितकर्म।।
अर्थ- लतावेष्टिक और वृक्षादिरूढक आलिंगनों को संभोग क्रिया करने से पहले ही खड़े-खड़े किया जाता है।

श्लोक-18. शयनगतावेवोरुव्यत्यांस भुजव्यत्यासं च ससंघर्षमिव घनं संस्वजेते तत्तिलतण्डुलकम्।।
अर्थ- तिलतण्डुलक :
पलंग पर लेटा हुआ पुरुष अगर स्त्री के दाईं ओर लेटा होता है तो उसे अपनी बाईं टांग को स्त्री की जांघों के बीच तथा बाएं हाथ को उसकी दाईं कांख के बीच डालना चाहिए और फिर स्त्री को भी पुरुष की ही तरह आलिंगन करना चाहिए। इस प्रकार के आलिंगन में दोनों की टांगें तथा भुजाएं उस तरह मिल जाती हैं जैसे कि चावल में तिल इसलिए इसको तिलतण्डुलकम आलिंगन कहते हैं।

श्लोक-19. रागान्धावनपेक्षितात्ययौ परस्परमनुविशत इवोत्सङंगतायामभिमुखोपविष्टायां शयने वेति क्षीरजलकम्।।
अर्थ- क्षीरजलक :
ज्यादा काम-उत्तेजित होने के बावजूद भी किसी चीज की परवाह न करते हुए जब स्त्री और पुरुष एक-दूसरे में समा जाने की कोशिश में मजबूत आलिंगन करते हैं तो उसे क्षीरजलक आलिंगन कहा जाता है। यह आलिंगन तभी मुमकिन हो सकता है जब स्त्री पुरुष की गोद में बैठकर अपनी दोनों टांगों को उसकी कमर में फंसा ले तथा दोनों अपनी-अपनी छाती को आपस में मिलाकर जोर-जोर से दबाएं। नहीं तो दोनों पलंग पर एक-दूसरे की तरफ मुंह करके लेटे रहें।

श्लोक-20. तदुभयं रागकाले।।
अर्थ : तिलतण्डुलक और शीर जलक आलिंगन तभी करने चाहिए जब दोनों की काम-उत्तेजना चरम सीमा पर पहुंचने वाली हो।

श्लोक-21. इत्युपगूहनयोगा बाभ्रवीयाः।।
अर्थ : आचार्य वाभ्रवीय द्वारा बताए गए आलिंगन के भेद समाप्त होते हैं।

श्लोक-22. सुवर्णनाभस्य त्वधिकमेकाङगोपगूहनचतुष्टयम्।।
अर्थ- इसमें सुवर्णानाभ जी के बताए गए चार प्रकार के आलिंगनों को बताया जा रहा है।

श्लोक-23. तत्रोरुसन्दंशेनैकमूरुमूरुद्वयं वा सर्वप्राणं पीडयेदित्यूरूपगूहनम्।।
अर्थ- अरुपगूहन :
स्त्री और पुरुष को एक-दूसरे की तरफ मुंह करके लेट जाना चाहिए तथा अपनी एक जांघ से सहभागी के एक जांघ को बहुत जोर से या दोनों जांघों से उसकी दोनों जांघों को जोर से दबाने को अरुपगूहन आलिंगन कहा जाता है।

श्लोक-24. जघनेन जघनमवपीडय्च प्रकीर्यमाणकेशहस्ता नखदशनप्रहणनचुम्बनप्रयोजनाय तदुपरि लङघयेत्तञ्ञघनोपगूहनम।।
अर्थ - जघनोपगूहन :  लेटी हुई अवस्था में जब स्त्री काम-उत्तेजना को तेज करने के लिए पुरुष की जांघ को अपनी जांघ से दबाती हुई उसके ऊपर लेट जाती है और फिर उसके मुंह को चूमती है, उसके शरीर पर दांतों से काटती हैं और नाखून गढ़ाती हैं तो उसे जघनोपगूहन आलिंगन कहते हैं।

श्लोक-25. स्तनाभ्यामुरः प्रविश्य तत्रैय भारमारोपयेदिति स्नालिङगनम्।।
अर्थ- स्तनालिंगन :
जब स्त्री अपने स्तनों को पुरुष की छाती से लगाकर उनका सारा वजन पुरुष की छाती पर डाल देती है और उसके बाद जोर से दबाती है तो उसे स्तनालिंगन आलिंगन कहते हैं।

श्लोक-26. मुखे मुखमासज्याक्षिणी अक्ष्णोर्ललाटेन ललाटमाहन्यात्यात्साललाटिका।।
अर्थ- ललाटिका :
अपने सहभागी के मुंह के सामने अपना मुंह और उसकी आंखों के सामने अपनी आंखें करके उसके मस्तक से अपने मस्तक को दबाने को ललाटिका आलिंगन कहा जाता है।

श्लोक-27. संवाहनमप्युपगूहनप्रकारमित्येके मन्यन्ते। संस्पर्शत्वात्।।
अर्थ- कुछ कामशास्त्रियों के अनुसार अपने मुट्ठी से अपने सहभागी के शरीर को दबाने की क्रिया को भी आलिंगन कहा जाता है क्योंकि इससे भी स्पर्श सुख मिलता है।

श्लोक-28. पृथक्कालत्वाद्धिन्नप्रयोजनत्वादसादारणत्वान्नेति वात्स्यायनः।।
अर्थ- आचार्य वात्स्यायन के मुताबिक मुट्ठी से शरीर को दबाने की क्रिया को आलिंगन नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह सिर्फ थकावट दूर करने के लिए होता है न कि संभोग क्रिया के लिए।

श्लोक-29. पृच्छतां श्रृण्वतां वापि तथा कथयतामपि। उपगृहविधिं कृत्स्नं रिरंसा जायते नृणाम्।।
अर्थ- जो भी व्यक्ति इस आलिंगन विधि को पूछेगा या सुनेगा या फिर किसी को बताएगा उसके अंदर भी स्त्री के साथ संभोग करने की इच्छा जागृत हो जाएगी और जो लोग इस विधि को प्रयोग में लाएंगें तो वह संभोग के समय मिलने वाले पूरे आनंद को प्राप्त करेंगे।

श्लोक-30. येऽपि ह्यशास्त्रिताः केचित्संयोगा रागवर्धनाः। आदरेणैव तेऽप्यत्र प्रयोज्याः सांप्रयोगिकाः।।
अर्थ- इनके अलावा बहुत से अशास्त्रीय लेकिन काम-उत्तेजना को बढ़ाने वाले आलिंगन हैं लेकिन उनके बारे में यहां पर बताया नहीं जा रहा है। संभोग क्रिया में प्रयुक्त होने वाले हर तरह के और बहुत से स्थानों में प्रचलित आलिंगन को यथास्थान और यथावसर प्रयोग में लाना चाहिए।

श्लोक-31. शास्त्राणां विषयस्तावद्यावन्मन्दरसा नराः। रतिचक्रे प्रवृत्ते तु नैव शास्त्रं न च क्रमः।।
अर्थ- शास्त्र के विषय की उसी समय तक जरूरत होती है जब तक कि व्यक्ति काम-उत्तेजना में अंधा नहीं हो जाता। क्योंकि इसके बाद तो शास्त्र और शास्त्र की बताई हूई किसी भी विधि का उपयोग नहीं किया जा सकता है।
स्त्री को संभोग करने के लिए तैयार करने की प्राकक्रीड़ा आलिंगन है। संभोग करने से पहले हर बार प्राकक्रीडा़ करना एक प्राकृतिक क्रिया ही नहीं बल्कि इस क्रिया का एक शुभ चरण भी है। सामान्य तौर पर इस बात को देखा गया है कि संभोग क्रिया से पहले की जाने वाली प्राकक्रीड़ा को पुरुष द्वारा ही पहल करके शुरु करना होता है।

आचार्य वात्स्यायन ने जिन 64 कलाओं के बारे में बताया है वह उन्हें संभोग क्रिया की प्रमुख भूमिका समझता है। आचार्य पद्मश्री अपने नागरसर्वस्व में हेलाविच्छिति विब्बोक, किलकिंचित, विभ्रम लीला, विलास, हावविक्षेप, विकृत, मद मोहायित, कुट्टामिति, मुग्धता, तपन और ललित अर्थात इन 16 भावों को संभोग की प्रवृत्ति समझते हैं।
ऊपर दिए गए 16 भाव स्त्री के अंदर काम-उत्तेजना जागृत होने पर पैदा होते हैं। पुरुष को स्त्री के इन भावों को समझकर संभोग करने से पहले की क्रियाएं जैसे आलिंगन, चुंबन आदि करने चाहिए। जो व्यक्ति स्त्री के इन हाव-भावों को न समझकर ठंडा पड़ा रहता है तथा जब खुद के अंदर काम-उत्तेजना जागृत होती है तो बिना भाव प्रकट किए आलिंगन के लिए तैयार हो जाता है तो ऐसे पुरुषों को न तो स्त्री का ही सुख प्राप्त होता है और न ही संभोग का सुख।
बहुत से विद्वानों के अनुसार सर्वगुण संपन्न और संभोग की 64 कलाओं में निपुण स्त्री गुणहीन और संकेतहीन पति को ऐसे फेंक देती हैं जैसे कि किसी मुरझाई हुई फूलों की माला को फेंक देते हैं।
पुरुष चाहे हर तरह की कला में सबसे ज्यादा निपुण हो लेकिन अगर स्त्री उसे काम-कला में अनाड़ी समझकर धिक्कार देती है तो उसे अपना जीवन बेकार समझना चाहिए।
अंगसंकेत : ज्ञानवृद्धक सवाल तथा कुछ कहने में काम का स्पर्श, कामोत्तेजित अवस्था में बालों का स्पर्श, प्यार का इजहार करने में स्तनों का स्पर्श हाथों के द्वारा करना चाहिए।
सही अवसर को जानने के लिए मध्यमा (हाथ की बीच वाली उंगली) उंगली को तर्जनी उंगली पर चढ़ाना तथा मौका मिलने का संकेत करने के लिए दोनों हाथों में अंजली बांध लेनी चाहिए और फिर बुलाने के लिए उसी उंगली को उल्टी कर लेनी चाहिए।
पूर्व दिशा के संकेत के लिए अंगूठे को प्रयोग किया जाता है। तर्जनी उंगली का दक्षिण दिशा के लिए, पश्चिम दिशा के लिए मध्यमा उंगली का और उत्तर दिशा के लिए अनामिका उंगली का प्रयोग करना चाहिए।
कनिष्का की जड़ से शुरू होकर अंगूठे की ऊर्ध्व रेखा तक हर उंगलियों में 3-3 रेखा करके 15 रेखा होती हैं और इन्हीं रेखाओं के द्वारा प्रतिपदा से लेकर 15 तिथियों का संकेत दिया जाता है। बाएं हाथ की रेखाओं से शुक्ल पक्ष की तिथियों का और दाएं हाथ की रेखा के द्वारा कृष्ण पक्ष की तिथियों का संकेत होता है।
पोटली संकेत : प्रेम की खबर पहुंचाने में खुशबूदार सुपारी, आतिथ्य प्रेम की सूचना पहुंचाने में कत्था और छोटी इलायची, जायफल और लौंग से संकेत दिया जाना चाहिए।
मूंगा प्रेम को भंग करने का संकेत है। बहुत दिनों के बाद संभोग करने पर 2 मूंगे. कम बुखार में कड़वी वस्तु, संभोग के संकेत के लिए मुनक्का होता है।
शरीर के समर्पण के लिए कपास, प्राणों को समर्पित करने में जीरा, डर का इशारा करने में भिलावा और अभय संकेत में हरड़ का संकेत होता है।
मोम की एक गोल सी टिकिया बना लें। फिर उसमें पांचों उंगलियों के नाखूनों के निशान बना दें और उसको लाल धागे से बांध दें। इसको पोटली संकेत कहा जाता है। मदन-क्रीड़ा के संकेत में मोम, अनुराग के लिए लाल धागे का बंधन और कामदेव द्वारा जख्मी होने की सूचना में पांचों उंगलियों के नाखून का निशान बनाया जाता है। इसी वजह से इसे पोटली संकेत कहा जाता है।
वस्त्र संकेत : जिसका शरीर कामदेव के बाण से कटा-फटा हो, ऐसी हालत का संकेत फटे हुए लेकिन अच्छे कपड़े दिखाकर किया जाता है। उत्कट प्रेम को दिखाने के लिए पीले या गेरुए रंग का कपड़ा देना जरूरी है।
जुदाई के समय फटे हुए कपड़ों से और मिलन के समय धागे के साथ बंधन भेजकर संकेत करना चाहिए। एक के प्रेम में एक कपड़ा और दो के प्रेम में दो कपड़े देकर प्रेम का संकेत करना चाहिए।
तांबूल संकेत : पान का बीड़ा 5 प्रकार का होता है-
• पलंग के आकार का
• चौकोना
• अंकुश के आकार का
• कौशन या श्लाका।
स्नेह की ज्यादती का संकेत करने के लिए कौशल पान (जिसको कलात्मक तरीके से लगाया जाता है) का प्रयोग करना चाहिए। मदन व्यथा में कंदर्प (तिकोना) बीडा़ देना चाहिए और संभोग करने का संकेत देने के लिए पलंग के आकार का बीड़ा देना चाहिए।
चौकोर पान की बीड़ा दिखाना अनसर का संकेत है। प्रेम के अभाव में बिना सुपारी का पान तथा प्रेम के सद्राव में इलायची के साथ पान देना चाहिए।
जुदाई में होने वाली हालत का संकेत पान उल्टा लगाकर काले धागे से बांधकर करना चाहिए। संयोग की हालत में एक पान के मुंह को दूसरे पान के मुंह से मिलाकर लाल धागे से बांधकर दिखाना चाहिए। त्याग की सूचना में पान को बीचों-बीच से फाड़कर काले धागे से बांधकर संकेत करना चाहिए।
अधिक अनुराग हो जाने पर पान के टुकड़े-टुकड़े करके जोड़ देना चाहिए। बीच में केशर भर दी जाए और बाहर चंदन का लेप कर देना चाहिए।
फूलों की माला का संकेत : अनुराग में लाल, वियोग में गेरुआ और स्नेह की कमी के कारण काले धागे की गूंथी हुई माला का उपयोग करना चाहिए। कामशास्त्र के लेखकों ने स्त्री की चंद्रकांत मणि से उपमा दी है। जिस प्रकार चंद्रकांत मणि चंद्रमा की शीतल किरणों का स्पर्श पाते ही पिघल जाती है उसी तरह से स्त्री पुरुष का संस्पर्श करते ही द्रवित हो जाती है। इसी वजह से बुद्धिमान पुरुष को स्त्री का उपभोग बहुत ही समझदारी के साथ करना चाहिए।
कामोत्तेजित होने के साथ-साथ उसमें विवेक होना बहुत जरूरी है। काम के विद्वानों ने काम के ग्रंथों की रचना उसी उद्देश्य से की है कि संभोग के समय में जानवर की तरह संभोग नहीं करना चाहिए।
आलिंगन : चुंबन तथा संकेतों आदि संस्पर्शों और स्त्री के स्वभाव आदि का मनोवैज्ञानिक शारीरिक अध्ययन करके ही संभोग क्रिया में लीन होना चाहिए।
श्लोक- इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे साम्प्रयोगिके द्वितीयेऽधिकरणे आलिंगनविचाराः द्वितीयोध्यायः।
द्वितीय अध्याय : आलिंगन विचार प्रकरण द्वितीय अध्याय : आलिंगन विचार प्रकरण Reviewed by Admin on 6:13 AM Rating: 5

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